पाकिस्तान के कब्जे के बाद गिलगित-बाल्टिस्तान में बहुसंख्यक ‘शिया मुस्लिम’ 80 फीसद से घटकर रह गए 39 फीसद

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा रहे गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान ने कब्जे के बाद लगातार जमीनी हालात बदले हैं। कुछ दशक पहले वहां पर 80 प्रतिशत शिया मुस्लिम आबादी थी, जो अब घटकर 39 प्रतिशत रह गई है। पाकिस्तान ने यह सब सोची-समझी रणनीति के तहत किया और वहां के मूलवासियों को कमजोर कर राजनीतिक चुनौती खड़ी होने की संभावना कमजोर कर दी। यह जानकारी एनसी बिपिंद्रा की अगुआई वाले नई दिल्ली के एक थिंक टैंक के अध्ययन में सामने आई है। अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार 15 लाख की आबादी वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में 39 प्रतिशत शिया मुसलमान, 27 प्रतिशत सुन्नी मुसलमान, 18 प्रतिशत इस्माइली और 16 प्रतिशत नूरबख्शी हैं। इलाके में आखिरी बार जनगणना 1998 में हुई थी। उस समय वहां की आबादी 8,70,000 थी। इसके बाद वहां पर बाहर से ले जाकर लोगों को बसाया जाना शुरू हो गया। अब वहां की आबादी बढ़कर 15 लाख हो गई है और बहुसंख्यक शिया 80 प्रतिशत से घटकर 39 प्रतिशत रह गए हैं। अध्ययन में पता चला है कि बीते 70 साल में पाकिस्तानी सेना ने यहां के लोगों की भावनाओं को कुचलने का हर संभव प्रयास किया। स्थानीय लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से काटे रखा जिससे वे अपने अधिकारों की बात न कह पाएं। 1988 के बाद गिलगित-बाल्टिस्तान के मूलवासियों का उत्पीड़न शुरू हुआ, जो समय के साथ बढ़ता चला गया। पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर राज्य के हिस्से पर तैयार रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तानी सेना के समर्थित आतंकियों ने सैकड़ों की संख्या में मूलवासियों को मारा, उनकी जमीन छीनी। एक अनुमान के अनुसार 1988 से 2013 के बीच सेना समर्थित सुन्नी आतंकियों ने करीब तीन हजार शिया लोगों को मारा और उनकी संपत्ति पर कब्जा किया। इससे बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे बेसहारा व यतीम हुए। इलाके में कई नरसंहार और धर्मस्थलों पर हमले हुए। मजलिस ए वहादतुल मुस्लेमीन के उप महासचिव अल्लामा असगर अस्करी कहते हैं शिया को निशाना बनाने की साजिश से पूरा समुदाय बुरी तरह आहत और बर्बाद हुआ। लोग अपनी जमीन पर ही लूटे-मारे गए। उनकी कोई सुनने वाला नहीं था। सरकार सिंध में मोर मारे जाने की घटनाओं पर तो गौर कर रही थी, लेकिन गिलगित-बाल्टिस्तान में आदमियों के मारे जाने की उसे कोई चिंता नहीं थी।

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