फेसबुक-ट्विटर घटा रहे हैं Post Reach और हो गए हैं पक्षपाती, क्या हो सकता है समाधान?

सोशल मीडिया प्लेटफोर्म्स पर लम्बे समय से राजनीतिक पूर्वाग्रह का आरोप लगता आया है। दक्षिण पंथी विचारकों और दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञों के विचारों को दबाने का आरोप कई बार इन प्लेटफोर्म्स पर लगा है।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : ओम तिवारी : सोशल मीडिया के बड़े प्लेटफोर्म्स पर अपनी निर्भरता के चलते क्या आज हम इनके दास बन गए हैं? क्या हमने इन कम्पनियों को अपनी वैचारिक स्वतंत्रता का मालिक बना दिया है?
आज फेसबुक(Facebook), ट्विटर(Twitter) और यूट्यूब(YouTube) जैसी कम्पनियाँ तय करती हैं कि किस व्यक्ति या संगठन के पोस्ट पूरी दुनिया में वायरल होंगे और किसके पोस्ट डिलीट कर दिए जाएँगे।
कई देशों की पूरी इकॉनमी से ज़्यादा अपना सालाना टर्नओवर रखने वाली इन सोशल मीडिया कम्पनियों ने पूरी दुनिया के संवाद(Communication) पर अपना अधिकार जमा लिया है।
दुनिया के छोटे-बड़े कारोबार(Business), राजनीति(Politics), पत्रकारिता(Journalism), कलाएँ(Arts), तकनीक(Technology) आदि दुनिया के हर प्रकार के विषयों पर काम कर रहे लोग इन सोशल मीडिया प्लेटफोर्म्स पर आज लगभग पूरी तरह से निर्भर हो चुके हैं। कई प्रकार के बिजनेस तो फेसबुक(Facebook), ट्विटर(Twitter), यूट्यूब(YouTube) जैसे प्लेटफोर्म्स पर इतना अधिक निर्भर हैं कि इन प्लेटफोर्म्स के बिना उनकी कल्पना नहीं हो सकती है।
इस प्रकार की निर्भरता के कितने नुक़सान हो सकते हैं इसकी चर्चा तो सालों से हो रही थी लेकिन उसका वास्तविक अनुभव तब दुनिया को हुआ जब अभी हाल ही में फेसबुक ने अपने पोस्ट्स(Facebook Posts) की पहुँच(Post Reach) के दायरे को एकदम से घटा दिया। इससे इन फेसबुक पर निर्भर कारोबारियों को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा।
फ़ेसबुक, ट्विटर यूट्यूब जैसे प्लेटफोर्म्स की दुनियाभर के लोगों के बीच गहरी पहुँच है लेकिन इन प्लेटफोर्म्स द्वारा अपनाई गयी कई नीतियाँ हाल के कुछ वर्षों में पक्षपातपूर्ण और अपने कई प्रकार के ग्राहकों के हितों के प्रति असंवेदनशील रही हैं। आइए हम देखते हैं ऐसे कौन से महत्वपूर्ण विषय हैं जिन पर इन कम्पनियों द्वारा लिए गए निर्णयों से दुनिया भर में लोग नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए।

कंटेंट की पहुँच (Content Reach)

सभी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म्स में लोगों द्वारा डाले गए कंटेंट की पहुँच कितने लोगों तक होगी यह पूरी तरह से कम्पनी द्वारा तय किया जाता है। आज इन प्लेटफोर्म्स का उपयोग हर प्रकार के लोग और संगठन करते हैं और यहाँ डाले गए कंटेंट से लोगों की व्यक्तिगत ज़िंदगी और संगठनों की छवि प्रभावित होती है।

कारोबारी विज्ञापनों की पहुँच में कमी (Decrease in Business Advertisement)

अनेक लोग सोशल मीडिया प्लेटफोर्म्स में अपने प्रोडक्ट का विज्ञापन(Advertisement) करते हैं। इन प्लेटफोर्म्स के जरिए दुनियाभर के लोगों के बीच उनके द्वारा दिए जा रहे प्रोडक्ट की जानकारी पहुँचे इसलिए इन प्लेटफोर्म्स का उपयोग किया जाता है। ऐसे में यह अत्यंत महत्वपूर्ण होता है कि कारोबारी जिन लोगों तक देश या विदेश में अपने प्रोडक्ट की जानकारी पहुँचाना चाहता है, उन ज़्यादा से ज़्यादा से लोगों तक उसका विज्ञापन इन प्लेटफोर्म्स के जरिए पहुँचे। लेकिन हाल में फेसबुक जैसी कम्पनियों के द्वारा ऐसे क़दम उठाए गए हैं जिससे दुनियाभर के लोगों में पहुँचने वाले विज्ञापन की पहुँच में बड़ी गिरावट आई है, जिसका सीधा असर उनके कारोबार पर पड़ा है।

राजनीतिक पूर्वाग्रह (Political Bias)

सोशल मीडिया प्लेटफोर्म्स पर लम्बे समय से राजनीतिक पूर्वाग्रह का आरोप लगता आया है। दक्षिण पंथी विचारकों और दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञों के विचारों को दबाने का आरोप कई बार इन प्लेटफोर्म्स पर लगा है।
ऐसा कई बार हुआ है जब अनेक साधारण यूज़र्स के साथ-साथ पत्रकारों और राजनीतिज्ञों के पोस्ट की रीच कम कर दी गयी। अनेक घटनाक्रमों में सिर्फ़ एक विशेष प्रकार जिसमें विशेषतया दक्षिणपंथी यूज़र्स के पोस्ट को टार्गेट किया गया।
वैश्विक परिदृश्य की बात करें तो दक्षिणपंथी डेमोक्रेटिक पार्टी से अमेरिका के राष्ट्रपति बने डॉनल्ड ट्रम्प के पोस्ट को फ़ेसबुक़ और ट्विटर द्वारा डिलीट किया गया और पूर्व में भी उनके अकाउंट को ट्विटर ने डिलीट कर दिया था।
राजनीतिक पूर्वाग्रह तो भारत में इन प्लेटफोर्म्स में इस स्तर तक बढ़ गया है कि भारत के संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने फ़ेसबुक की नीतियों को भाजपा और दक्षिण पंथी विचार के प्रति नकारात्मक पूर्वाग्रह से भरा बताया था।
ट्विटर के दक्षिणपंथी नकारात्मक पूर्वाग्ग्रहों का गवाह तो देश कई बार बना इसके बड़े उदाहरणों में गायक सोनू निगम और अभिनेत्री कंगना रानाउत की बहन रंगोली चंदेल शामिल हैं।

पत्रकारों के लिए पूर्वाग्रह (Bias towards Journalists)

अपनी बात को साफ़ सुथरे ढंग से जनता तक पहुँचाने के लिए और सीधा संवाद स्थापित करने के लिए पत्रकार भी सोशल मीडिया का जमकर उपयोग करते हैं। आज इंटरनेट के युग में पत्रकारों के लिए यह सोशल मीडिया प्लेटफोर्म्स अत्यंत उपयगी साबित हुए हैं। लेकिन इन सब के बीच पत्रकारों की ख़बरों को पर्याप्त पहुँच दे पाने में ये प्लेटफोर्म्स असफल साबित हुए हैं।
इसके ऊपर से एक बार फिर से पत्रकारों को भी राजनीतिक पक्षपात का सामना करना पड़ता है। यदि वे इन प्लेटफोर्म्स में दक्षिणपंथी विचारकों और नेताओं बुराई नहीं करते और उनके विरुद्ध ख़बरें नहीं लिखते तो इन प्लेटफोर्म्स पर इनकी प्रोफ़ाइल्स को वेरिफ़िकेशन मिल पाना बहुत कठिन होता है। जबकि वामपंथी झुकाव के पत्रकारों और लोगों को बहुत आसानी से ट्विटर में ब्लू टिक और फ़ेसबुक में प्रोफ़ाइल वेरिफ़िकेशन मिलते देखा जाता है।

आख़िर इस समस्या का हल क्या है ?

इस प्रकार की समस्या से निपटने का उपाय एक ही है और वो है ऐसा सोशल मीडिया प्लेटफोर्म् जो कंटेंट की पहुँच और प्रकार के प्रति पूर्वाग्रह ना रखे। आज देश और दुनिया के कारोबार से लेकर फ़िल्मी संसार एवं धर्म से लेकर राजनीति तक को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाले इन सोशल मीडिया प्लेटफोर्म्स में पूर्वाग्रह भर गए हैं। ऐसे में हम विकल्पों पर विचार कर सकते हैं जो दुनिया भर में उठ रही आवाज़ों को दबाने का काम ना करे।

स्क्रोल लिंक (www.scrolllink.com)

जब हम वैकल्पिक सोशल मीडिया प्लेटफोर्म् को ढूँढते हैं तो भारत में निर्मित स्क्रोल लिंक (www.scrolllink.com) का नाम उभरकर आता है। इस प्लेटफोर्म् को डिज़ाइन करने का उद्देश्य ही  यह रहा है कि किसी की आवाज़ को दबाया ना जा सके।
अन्य प्लेटफोर्म्स में विज्ञापनों एवं पोस्ट के रीच को कम कर दिया गया है जिससे कारोबारियों को बड़ा नुक़सान उठाना पड़ा है। स्क्रोल लिंक में यह विशेष फ़ीचर उपलब्ध है जिससे आप दुनिया भर के यूज़र्स के बीच अपने पोस्ट और विज्ञापन को आसानी से अधिकतम मात्रा में पहुँचा सकते हैं।
पत्रकारों की अभिव्यक्ति और हितों की रक्षा हो सके इसलिए स्क्रोल लिंक में पत्रकारों की प्रोफ़ायल वेरिफ़िकेशन को तीव्र गति से करने की सुविधा उपलब्ध है। इसके आलावा वे अपनी बात को अधिकतम लोगों तक पहुँचा सकें इसलिए पत्रकारों की पोस्ट को अधिकतम लोगों तक पहुँचाने की व्यवस्था भी है। साथ ही यहाँ वे निश्चिन्त होकर अपने विचार साझा कर सकते हैं क्योंकि इस प्लेटफोर्म् में पूर्व में चर्चा किए गए सोशल मीडिया प्लेटफोर्म्स की तरह का कोई पूर्वाग्रह नहीं है।

दुनिया भर के ग्राहकों को अपना सामान और सर्विस बेच रहे भारतीयों के लिए फेसबुक जैसे प्लेटफोर्म्स द्वारा Post Reach कम करना बहुत नकारात्मक क़दम है, जिससे इन कारोबारियों का अस्तित्व ख़तरे में आ गया है। आज जब सारी दुनिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रही है तब किसी के विचारों को दबाने की कोशिशों का निश्चित रूप विरोध होना आवश्यक है। इसके साथ ही यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि हमारा अस्तित्व और हमारे विचार किसी विदेशी कम्पनी के दास बनकर ना रह जाएँ इसलिए अपने वैचारिक और भौतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए  स्क्रोल लिंक जैसे वैकल्पिक संसाधनों का हम उपयोग अवश्य करें।

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