डार्क मीडिया और भारत के संत

ओम तिवारी : भेड़ की खाल ओढ़े आज का मीडिया धीरे धीरे समाज और संस्कृति को नोच रहा है.

आजकल मीडिया का एक बड़ा वर्ग अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए बड़े घडियाली आंसू बहा रहा है. कहा जा रहा है की उनकी बोलने की आजादी छीनी जा रही है, पर विडम्बना ये है कि यही लोग समाज और देश के मुंह में अपने बोल ठूस रहे हैं. जो लोग इनकी बात मानने से इनकार करते हैं या फिर अलग विचारधारा के हैं, उनको ये तथाकथित पत्रकार और मीडिया के लोग अनेक प्रकार से नोचने और बदनाम करने में लग जाते हैं. भारतीय जनमानस का एक बड़ा प्रमुख और प्रबुद्ध वर्ग इनकी इन दोगलेपन से भरी नीतियों के प्रति अब जागरूक हो चुका है.

परन्तु साथ ही लम्बे समय तक गुलामी करने के कारण भारतीय मानस का एक बड़ा वर्ग अब स्वयं के लिए सोचने में अक्षम हो चुका है. बहुसंख्यक भारतीय जनता इस बात का फैसला नहीं कर पाती कि उसके लिए सही और गलत क्या है. इसलिए इस रिक्तता को भरने के लिए भेड़िए, जो कि स्वयं को तथाकथित रूप से बुद्धिजीवी कहते हैं, गीध दृष्टि से घात लगाकर बैठे हैं.

मौका मिलते ही ये लोग पूरा जोर लगाकर भारतीय सामाजिक अस्मिता को नष्ट करने के लिए भोंकना शुरू कर देते हैं. लेकिन साथ ही दुखद बात ये है कि जब ये जोर की आवाज़ में झूठ बोलते हैं तो भीरु हो चुके भारतीय लोग उनकी बातों को परम सत्य मान लेते हैं. यहाँ सदियों की गुलामी अब खून में जो जा चुकी है,  नहीं तो क्या ऐसा कभी हो सकता था कि अपने घर को जलाने के लिए ही आज लोग बड़े जोर से नारे लगाएं, और हमें फिर से नष्ट कर गुलाम बनाने  की राह तके तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए अपनी जीभ निकालकर दुम हिलाते हुए चाटुकारिता करते फिरें.

किसी की धर्म और आस्था उसका बड़ा ही व्यक्तिगत मामला है. हर व्यक्ति अपना समय और धन अपनी मर्जी के अनुसार हर उस जगह लगाने के लिए स्वतंत्र है जहाँ उसे सही लगे. बस शर्त यह है की उसके इस काम के जरिए किसी व्यक्ति को या राष्ट्र को कोई नुकसान नहीं हो.

संविधान ने केवल दोगले लोगों को बस ही बोलने का अधिकार नहीं दिया है, बल्कि बोलने का अधिकार भारतीय मिट्टी में जन्मे हर नागरिक को है. हर भारतीय नागरिक को अपने राष्ट्र और संस्कृति के बारे में बोलने का पूरा अधिकार है.



लेकिन जब कोई साहसी, बुद्धिमान और प्रभावशाली व्यक्तित्व इन सांस्कृतिक आक्रान्ताओं से त्रस्त होकर समाज को सत्य बताना शुरू करता है, तो इन षडयंत्रकारियों के पेट में मरोड़ें उठने लगती हैं, इनको दस्त लगने शुरू हो जाते हैं, और फिर ये अपने शरीर में लगी इस गन्दगी को उस व्यक्ति के ऊपर उछालना शुरू कर देते हैं, जो समाज सत्य बताने का साहस कर रहा है.

संस्कृति की विशालता को शर्मिंदगी मानने की हद तक भूल चुके भारतीय लोग, पश्चिम से आए किसी भी विचार को आँख बंद कर स्वीकार कर लेते हैं. परंतु अब अमेरिका में ट्रंप का आया नया प्रशासन इस बात का स्पष्ट सन्देश दे रहा है कि इन विष से भरे कायर षडयंत्रकारियों का समय अब समाप्ति की ओर है. दुनिया भर के लोग अपनी संस्कृति पर किए जा रहे प्रहारों के प्रति सचेत हो रहे हैं.

अब समय आ गया है कि भारतीय लोग भी इस बात को समझें कि कौन उन्हें नुकसान पहुंचाने के इरादे से आया है, और कौन उन्हें सही मार्गदर्शन दे रहा है.

अमेरिका में सत्ता में आए लोगों का अन्धानुकरण करना भारतीय जनमानस के लिए कदापि उचित नहीं हो सकता, लेकिन अमेरिका में सत्ता में आए लोगों के जरिए भारतीय जनमानस एक संदेश जरूर ग्रहण कर सकता है, कि वह समय अब समाप्ति की ओर है, जिसमें चिल्लाकर बार-बार झूठ बोलने वाले लोग जनता को भ्रमित करने में सफल हो जाते थे.

आमतौर पर वर्तमान समय में भारतीय लोग पश्चिम से आई किसी भी वस्तु को देवता के वरदान की तरह देखते हैं, तो अब समय आ गया है कि ट्रंप विजय के इस संदेश को भी वह ग्रहण करें, और समझें कि भारत के तथाकथित बुद्धिजीवी और मीडिया अंदर से सड़ चुके हैं, और इनकी सड़ांध से पूरे देश में वैचारिक अक्षमता की बदबू फैल चुकी है.

इन लोगों के नाम लेना भी इन्हें महत्व देना है, लेकिन समय कुछ ऐसा है कि इनका प्रभाव आज व्यापक स्तर पर फैला हुआ है, इसलिए एक उदाहरण की ओर चलते हैं.

देवकीनंदन ठाकुर एक भागवताचार्य हैं और साथ ही अपने प्रवचनों में वह देश और समाज से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार सभा में उपस्थित लोगों से साझा करते हैं, सभा में उपस्थित लोगों के प्रश्नों का उत्तर भी वह अपनी समझ के अनुसार देते हैं, और जो लोग उनके विचार जानना चाहते हैं वह अवश्य ही उन प्रश्नों के उत्तर पाकर लाभान्वित होते हैं.

देवकीनंदन का कहना है कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए. पूर्वकाल में घटनाएं जैसी घटित हुई थीं, उनको उसी तरह से समाज को बताना चाहिए, बताने का माध्यम चाहे कोई भी हो. यदि ऐसा नहीं किया जाता है, और यदि कुछ लोगों द्वारा किसी माध्यम से इतिहास को तोड़ा मरोड़ा जाता है, तो उन लोगों का विरोध अवश्य किया जाना चाहिए.

हर व्यक्ति को अपनी संस्कृति की रक्षा में आवाज उठाने का अधिकार है. देवकीनंदन भी भारतीय हैं, और उसी संस्कृति से आते हैं, जिस पर वार किया जा रहा है और जिसके इतिहास को अनर्गल ढंग से इस दुनिया के सामने लाने की साजिश रची जा रही है.




ऐसी स्थिति में अगर देवकीनंदन असंतुष्ट होकर यह कहते हैं कि यह गलत है, और भारतीय जनता को इन साजिशों का विरोध करना चाहिए तो वह अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत बिल्कुल सही हैं. हर व्यक्ति को भारतीय संविधान में समानता से अभिव्यक्ति का अधिकार दिया गया है, और हर व्यक्ति अपने इस अधिकार का हर उस जगह इस्तेमाल कर सकता है, जहां उसे लगता है कि उसके साथ और उन चीजों के साथ गलत हो रहा है जो उसे प्रिय हैं.

देवकीनंदन ने अपने इसी अधिकार का इस्तेमाल किया.

लेकिन इस लिंक https://www.thelallantop.com/bherant/devakinandan-thakur-is-the-new-entry-in-padmavati-row-says-film-should-be-banned/  पर जो कि लल्लनटॉप मीडिया हाउस के न्यूज़ की एक लिंक है, में कहा जा रहा है कि देवकीनंदन ने गलत किया है. इस लेख को इतनी खूबसूरती से देवकीनंदन के खिलाफ लिखा गया है, और ऐसी लच्छेदार भाषा का इस्तेमाल किया गया है, कि इसे पढ़कर लोग भ्रमित हो जाएं, और देवकीनंदन को न जानने वाले लोग सच में उन्हें गलत प्रकाश में देखने लगें. अगर आप वीडियो देखते हैं जो कि इस लिंक में लेख के साथ संलग्न हैं, तो उसमें आप देखेंगे कि देवकीनंदन यही कहते नजर आ रहे हैं, कि संस्कृति को तोड़ने वाली और गलत इतिहास बताने वाली फिल्म बैन होनी चाहिए.

लेकिन लेख में बड़ी खूबसूरती से लेखक, पाठकों से यह कह रहा है कि, देवकीनंदन जनता को भड़का रहे हैं. नासमझ पाठक ही लेखक की बातों से भ्रमित होंगे, लेकिन जागरूक पाठक जो देवकीनंदन को और ऐसे मिडिया हाउसों के सच को जानते हैं, वह जल्द ही समझ जाएंगे कि, लेखक एक समाज विशेष को गलत प्रकाश में दिखाने के लिए देवकीनंदन को निशाने पर ले रहा है.

कोई भी समाज या कोई भी देश, यदि अपने गौरवशाली इतिहास को कुछ विष से भरे लोगों द्वारा असंगत और निरर्थक बनाने देता है तो निश्चय ही एक दिन उसका पतन हो जाएगा.

जब कोई समाज अपने विराट इतिहास का आदर करते हुए अपने पूर्वजों की महानता को याद रखता है, और संस्कृति की उच्च विचारधाराओं का आदरपूर्वक पालन करता है, तो उसकी नई पीढ़ी में तेज और गर्व की भावना सहज ही उपस्थित होती है, हीनता कभी उनके ह्रदय में प्रवेश ही नहीं कर पाती. अपने गौरवशाली इतिहास पर गर्व से भरे हुए देश को गुलाम नहीं बनाया जा सकता, उन्हें नष्ट नहीं किया जा सकता. देवकीनंदन इस बात को जानते हैं, इसलिए वह चाहते हैं कि, संस्कृति और इतिहास को हीन करके दिखाने वाली फिल्में या अन्य माध्यम समाज के संपर्क में ना आने पाएं, इसलिए वह खुलकर इनके विरोध में अपनी बात रखते हैं.

देवकीनंदन और उनके जैसे विचार वाले लोगों की यह मुखरता, इस मीडिया हाउस, इसके लेखक और साथ ही इनके जैसे अन्य बहुत सारे लोगों को नहीं पचती. क्योंकि ये लोग चाहते हैं कि भारत के लोग मूढ़ बुद्धि और हीन भावना से ग्रस्त हो जाएं. इन लोगों का उद्देश्य है कि, भारतीय दीन हीन होकर एक बार फिर भेड़ों की तरह गुलामी की जंजीरों में बंध जाएं. इसलिए ये मीडिया हॉउस देवकीनंदन जैसे लोगों के खिलाफ ज़हर उगलते हैं.

लेकिन भारतीय जनता धीरे-धीरे इन कालिख से भरे लोगों के प्रति जागरुक हो रही है, और इनके द्वारा फेंके गए कीचड़ को इंसान से अलग कर इंसान का आदर करना सीख रही है. वह समय अब दूर नहीं जब इन गंदगी से भरे हुए मीडिया हाउस और इनके पत्रकारों को पूरी तरह से भारतीय जनमानस नकार देगा, और एक सकारात्मक मीडिया और सकारात्मक समय की ओर समाज अपने कदम बढ़ाएगा.

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