भारतीय नौसेना की बढ़ेगी ताकत, नौसेना खरीदने जा रही अमेरिकी एमक्यू-1 प्रीडेटर ड्रोन ।

यह ड्रोन 50 हजार फीट की ऊंचाई पर 35 घंटे तक उड़ान भरने में सक्षम है।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ): भारत अपनी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सेना की ताकत बढ़ा रहा है। भारतीय नौसेना हिंद महासागर में चीन और पाकिस्तान से बढ़ते खतरे के बीच एमक्यू-1 प्रीडेटर ड्रोन की 30 यूनिट खरीदने का मन बना रही है। घातक मिसाइलों से लैस ये ड्रोन लंबे समय तक समुद्र में निगरानी कर सकते हैं। इतना ही नहीं, जरुरत पड़ने पर इसमें लगी मिसाइलें दुश्मनों के जहाजों या ठिकानों को निशाना भी बना सकती हैं। इस ड्रोन को प्रीडेटर सी एवेंजर या आरक्यू-1 के नाम से भी जाना जाता है। चीन के विंग लॉन्ग ड्रोन-2 के हमला करने की ताकत को देखते हुए नौसेना को ऐसे खतरनाक ड्रोन की काफी जरूरत महसूस हो रही है।
प्रीडेटर सी एवेंजर में टर्बोफैन इंजिन और स्टील्थ एयरक्राफ्ट के तमाम फीचर हैं। ये अपने टॉरगेट पर सटीक निशाना लगाता है। भारतीय सेना अभी इजराइल से खरीदे गए ड्रोन्स का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन अमेरिका के प्रीडेटर ड्रोन फाइटर जेट की रफ्तार से उड़ते हैं। इन ड्रोन्स के मिलने के बाद भारत न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि चीन पर भी आसानी से नजर रख सकेगा। सर्विलांस सिस्टम के मामले में भारत इन दोनों देशों से काफी आगे निकल जाएगा।
नया प्रीडेटर अपने बेस से उड़ान भरने के बाद 1800 मील (2,900 किलोमीटर) उड़ सकता है। मतलब अगर उसे मध्य भारत के किसी एयरबेस से ऑपरेट किया जाए तो वह जम्मू-कश्मीर में चीन और पाकिस्तान की सीमा तक निगहबानी कर सकता है। यह ड्रोन 50 हजार फीट की ऊंचाई पर 35 घंटे तक उड़ान भरने में सक्षम है। इसके अलावा यह ड्रोन 6500 पाउंड का पेलोड लेकर उड़ सकता है।
इस ड्रोन को अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स एयरोनॉटिकल सिस्टम्स ने बनाया है। इस ड्रोन में 115 हॉर्सपावर की ताकत प्रदान करने वाला टर्बोफैन इंजन लगा हुआ है। 8.22 मीटर लंबे और 2.1 मीटर ऊंचे इस ड्रोन के पंखों की चौड़ाई 16.8 मीटर है। 100 गैलन तक की फ्यूल कैपिसिटी होने के कारण इस ड्रोन का फ्लाइट इंड्यूरेंस भी काफी ज्यादा है।
चीन का दावा है कि इससे चीन-पाकिस्‍तान आर्थिक कॉरिडोर और बलूचिस्‍तान में बन रहे चीनी नौसेना के बेस की सुरक्षा की जा सकेगी। पाकिस्‍तान अब अपनी एयरफोर्स के लिए चीन के साथ मिलकर ऐसे 48 हमलावर ड्रोन विमान बनाना चाहता है। GJ-2 ड्रोन विंग लोंग II का सैन्‍य संस्‍करण है। माना जाता है कि इस चीनी ड्रोन विमान में 12 हवा से जमीन में मार करने वाली मिसाइलें लगी रहती हैं। इस ड्रोन विमान का लीबिया के गृहयुद्ध में इस्‍तेमाल किया जा रहा है लेकिन वहां इसे बहुत सीमित सफलता म‍िल रही है।
चीन और पाकिस्‍तान के इस संयुक्‍त खतरे को देखते हुए भारत ने अमेरिका से प्रीडेटर बी या ड्रोन खरीदने की इच्‍छा जताई है। भारत अमेरिका से 30 ऐसे हमलावर ड्रोन विमान खरीदना चाहता है। भारत इस समय लद्दाख में इजरायल निर्मित हेरोन ड्रोन विमानों का संचालन कर रहा है जिसमें कोई हथियार नहीं होता है। चीन के इस खतरे को देखते हुए भारत जल्‍द से जल्‍द अमेरिकी ड्रोन विमान खरीदना चाहता है। सूत्रों के मुताबिक ये 10-10 ड्रोन तीनों सेनाओं के लिए खरीदे जाएंगे।
इराक के बगदाद इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर अमेरिकी हमले में ईरान के टॉप कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी की मौत हो गई थी। माना जाता है कि इस हमले को अमेरिका ने अपने प्रीडेटर बी ड्रोन के जरिए अंजाम दिया था। यह बेहद उन्नत किस्म का टोही और लक्ष्यभेदी ड्रोन है। इस ड्रोन की खास बात यह है कि यह जासूसी में जितना माहिर है, उतना ही खतरनाक हवाई हमले करने में भी है। दरअसल, अमेरिका ने पहली बार ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी पर इस ड्रोन का इस्तेमाल नहीं किया है। इससे पहले भी दुश्मनों को निशाना बनाने के लिए इसका इस्तेमाल हो चुका है।
प्रीडेटर बी ड्रोन अटैक के साथ- साथ लक्ष्य की खुफिया जानकारी जुटाता है और फिर उसे खत्म करने के लिए हमले भी करने में सक्षम है। यानी, यह ड्रोन तलाश और विध्वंस का दोहरा काम करने में माहिर है। हथियारों से लैस, मध्यम ऊंचाई तक पहुंचाने वाला, एक साथ कई अभियानों को अंजाम देने और लंबी देर तक हवा में रहने में सक्षम ड्रोन है। अमेरिकी वायुसेना 2007 से इसका इस्तेमाल कर रही है। यह ड्रोन 230 मील (368 किलोमीटर) प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ता है। MQ-9 रीपर अधिकतम 50 हजार फीट तक की ऊंचाई तक पहुंच सकता है।
अमेरिका ने MQ-9 रीपर ड्रोन को विदेशी सैन्य अभियानों की मदद के मकसद से विकसित किया। इसमें M अमेरिकी रक्षा विभाग के मल्टि-रोल डेजिग्नेशन का प्रतिनिधित्व करता है जबकि Q का मतलब दूर से संचालित एयरक्राफ्ट है। वहीं, 9 का मतलब है कि यह अपनी तरह के एयरक्राफ्ट का 9वीं सीरीज है। 2,222 किलो वजनी यह ड्रोन छोटी-छोटी गतिविधियों का भी पता लगा लेता है और बेहद कम समय में लक्ष्य को निशाना बना लेता है। इसमें एक बार में 2,200 लीटर फ्यूल भरा जा सकता है जिससे यह 1,150 मील यानी 1,851 किलो मीटर तक की दूरी तय कर सकता है। इसकी एक यूनिट की कीमत साल 2006 में 6.42 लाख डॉलर (करीब 3.65 करोड़ रुपये) आंकी गई थी।
इस ड्रोन में कई बेहद घातक हथियार लगे होते हैं। इनमें लेजर से निर्देशित होने वाले हवा से जमीन पर मार करने वाले चार AGM-114 हेलफायर मिसाइल भी शामिल हैं। ये मिसाइल बिल्कुल लक्ष्य पर निशाना साधते हैं जिससे कि आसपास कम-से-कम नुकसान हो। साथ ही, इसमें टारगेटिंग सिस्टम लगा है जिसमें विजुअल सेंसर्स लगे हैं। इसमें 1,701 किलो वजन तक का बम गिराने की क्षमता है। MQ-9 रीपर चूंकि मानवरहित छोटा विमान है, इसलिए इसके अंदर कोई पायलट या क्रू नहीं होता है। इसे दूर से ही संचालित किया जाता है। हर MQ-9 रीपर ड्रोन के लिए एक पायलट और एक सेंसर ऑपरेटर सुनिश्चित होते हैं।
यह ड्रोन 204 किलोग्राम की मिसाइलों को लेकर उड़ान भर सकता है। 25000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर उड़ने के कारण दुश्मन इस ड्रोन को आसानी से पकड़ नहीं पाते हैं। इसमें दो लेजर गाइडेड एजीएम-114 हेलफायर मिसाइलें लगाई जा सकती हैं। इसे ऑपरेट करने के लिए दो लोगों की जरूरत होती है, जिसमें से एक पायलट और दूसरा सेंसर ऑपरेटर होता है। अमेरिका के पास यह ड्रोन 150 की संख्या में उपलब्ध हैं। फिलहाल यह स्पष्ट है की इस ड्रोन के नौसेना में शामिल होने से नौसेना की ताकत में बड़ा इजाफा होगा।

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