राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कौन होगा सरकार्यवाह यानी महासचिव पद का अधिकारी

यह पहला मौका है जब हर तीन साल में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक नागपुर से बाहर हो रही है।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ):  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में संगठन का सारा कामकाज सरकार्यवाह ही देखते हैं। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की दो दिवसीय बैठक शुक्रवार से बेंगलुरु में शुरू हुई। संघ में नंबर दो कौन बनेगा, इस पर शनिवार को फैसला होना है। सुरेश भैय्याजी जोशी 2009 से सरकार्यवाह यानी महासचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। तीन साल पहले 2018 में भी उन्होंने पद छोड़ने की पेशकश की थी। पर 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए उनका कार्यकाल बढ़ाया गया था। संघ में होने वाले बड़े बदलावों के मद्देनजर बेंगलुरु की बैठक महत्वपूर्ण है। यह पहला मौका है जब हर तीन साल में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक नागपुर से बाहर हो रही है। आम तौर पर इस सभा में 1,500 प्रतिनिधि भाग लेते हैं, पर इस बार कोरोनावायरस संक्रमण को देखते हुए सिर्फ 450 प्रतिनिधि ही बेंगलुरु में हैं। करीब 1,000 प्रतिनिधि 44 स्थानों से वर्चुअल तौर पर बैठक से जुड़े हैं। यह समझने के लिए संघ की व्यवस्था को समझना होगा। संघ प्रमुख या सरसंघचालक के लिए चुनाव नहीं होते। संघ प्रमुख अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति करते हैं। केएस सुदर्शन ने ही मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत की नियुक्ति की थी। पर संघ प्रमुख की भूमिका मुख्य तौर पर मार्गदर्शन की होती है। संगठन का सारा कामकाज सरकार्यवाह ही देखते हैं। सरकार्यवाह का चुनाव हर तीन साल में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में होता है। तीन साल का ही कार्यकाल भी होता है। आम तौर पर सभा की बैठक मार्च के दूसरे या तीसरे हफ्ते में तीन दिन के लिए होती है और शुक्रवार को शुरू होकर रविवार को खत्म होती है। इस बार यह बैठक दो दिन के लिए है और शनिवार को खत्म हो जाएगी। जहां तक सालाना बैठक का सवाल है तो वह देशभर में कहीं भी हो सकती है। पर तीन साल में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक हमेशा से नागपुर में होती आई है। पिछले साल की सालाना बैठक बेंगलुरु में होनी थी, पर अंतिम क्षणों में उसे कैंसिल कर दिया गया था। उस समय तक कई प्रतिनिधि बेंगलुरु पहुंच भी चुके थे। सरकार्यवाह का चुनाव आम तौर पर तीन दिन की बैठक में दूसरे दिन होता है। इस साल यह दो दिन की मीटिंग में भी दूसरे दिन ही होगा। संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार ने कहा कि जनसेवा विद्या केंद्र, बेंगलुरु में सभा 20 मार्च को दूसरे सत्र में सरकार्यवाह के चुनाव की प्रक्रिया पूरी करेगी। आम तौर पर सरकार्यवाह अपने कार्यकाल में किए गए कामों की जानकारी देता है। साथ ही सूचना देता है कि उसका कार्यकाल खत्म हो गया है, इस वजह से नया सरकार्यवाह चुना जाना चाहिए। तब वरिष्ठ स्वयंसेवकों में से किसी को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया जाता है। कोई वरिष्ठ नेता नए सरकार्यवाह के नाम का प्रस्ताव रखता है। यह नाम आम तौर पर स्वीकार कर लिया जाता है और सरकार्यवाह को निर्वाचित घोषित किया जाता है। चुने जाने के बाद नया सरकार्यवाह ही अपनी टीम की घोषणा करता है। सरकार्यवाह को चुने जाने की मौजूदा प्रक्रिया 1950 के दशक में अपनाई गई थी। आपातकाल (1975-77) के दौरान और 1993 में चुनाव नहीं हुए थे। बाबरी मस्जिद ढांचे के ढहने के बाद संघ को प्रतिबंधित संगठन घोषित किया गया था। इस वजह से 1993 में चुनाव नहीं हुए थे। हां, यह संभव है। पर होना थोड़ा मुश्किल लग रहा है। वे 74 वर्ष के हो चुके हैं। इस बार जो सरकार्यवाह बनेगा, वह 2025 में संघ के शताब्दी वर्ष तक कायम रहेगा। इस दौरान 2024 के लोकसभा चुनाव भी महत्वपूर्ण हैं। वहीं, 2018 में जोशी पद छोड़ने के संकेत दे चुके हैं। ऐसे में एक और कार्यकाल देना थोड़ा मुश्किल लग रहा है। संघ के कार्यकारी प्रमुख यानी सरकार्यवाह का कंट्रोल संगठन की प्रत्येक गतिविधि पर होता है। मौजूदा सरकार्यवाह सुरेश भैय्याजी जोशी तीन साल का अपना चौथा कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। इससे पहले सिर्फ एचवी शेषाद्री ही चार लगातार कार्यकाल (1987 से 2000) तक सरकार्यवाह रहे थे। आम तौर पर सरकार्यवाह का चुनाव सह-सरकार्यवाहों यानी संयुक्त महासचिव में से होता है। पर यह अनिवार्य नहीं है। 2009 में जब जोशी सरकार्यवाह चुने गए थे, तब वे अखिल भारतीय सेवा प्रमुख थे, सह-सरकार्यवाह नहीं। इस समय भैय्याजी जोशी के साथ 6 सह-सरकार्यवाह हैं- दत्तात्रेय होसाबले, सुरेश सोनी, डॉ. कृष्णा गोपाल, मनमोहन वैद्य, बी. भगैया और सीआर मुकुंद। सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसाबले। वे अभी 65 वर्ष के हैं। 71 वर्ष की उम्र होने तक सरकार्यवाह के दो कार्यकाल पूरे कर सकते हैं। इन दो कार्यकाल में वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव और संघ का जन्मशताब्दी वर्ष भी संभाल सकते हैं। इसके अलावा, संघ का दक्षिण पर फोकस है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में चुनाव हैं। कर्नाटक से ताल्लुक रखने वाले होसाबले इसमें मददगार हो सकते हैं। एबीवीपी में लंबे समय तक रहने के दौरान दत्तात्रेय के पास संगठन चलाने का अनुभव भी है।

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