महायोगी योगेंद्र नाथ का कौल संन्यास के साथ अध्यात्म की अनंत यात्रा का आरंभ ।

कौल सिद्ध सन्यास अन्य संप्रदायों में दिए जाने वाले सन्यास से अलग है क्योंकि अन्य संप्रदायों में दिया जाने वाला सन्यास तंत्र में नहीं बल्कि ‘परित्याग’ या ‘वैराग्य’ पर केंद्रित होता है।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ): हमारे एक पत्रकार को उनकी इस दीक्षा प्रक्रिया का साक्षी होने का अवसर मिला। हम महायोगी योगेंदर नाथ के साथ लगातार सम्पर्क में थे। उन्होंने हमें पहले ही बताया था कि वह 15 जनवरी 2021 के दिन मकर सक्रांति के शुभ अवसर पर सन्यास दीक्षा ग्रहण करेंगे।
महायोगी योगेंदर नाथ से एक लम्बे समय अंतराल के बाद हमें बात करने का मौक़ा मिला। एक नए व्यक्तित्व और महायोगी की उपमा प्राप्त होने के बाद उन्होंने हमसे अपने संन्यास दीक्षा के अनुभवों को साझा किया। लॉकडाउन के कारण हम उनसे लम्बे समय से मिल नहीं पाए थे और उन्होंने यह समय कौलान्तक पीठाधीश्वर महासिद्ध सत्येन्द्र नाथ जी महाराज जिन्हे लोग ईशपुत्र कहकर संबोधित करते हैं, उनसे सिद्धों की प्राचीन लिपि टाँकरी सीखने में व्यतीत किया, जिसमें सिद्धों द्वारा तांत्रिक ग्रंथ लिखे गए हैं। इस अवसर पर उन्होंने अत्यंत जटिल लेकिन उतना ही सुंदर सन्यास लिया जो ‘कौल सिद्ध धर्म’ के अंतर्गत ‘कौल संहार संन्यास’ कहा जाता है।
हमारे रिपोर्टर के अनुसार दीक्षा संस्कार के दौरान शिव शक्ति के रूप ‘स्वच्छंद भैरव’ और मां ‘कुरुकुल्ला’ की बड़ी मूर्तियां रखी गई थीं। इन मूर्तियों के बगल में उनके गुरु का एक बड़ा राजसिक सिंहासन रखा गया थाl सिंहासन के सामने ‘हवन कुंड’ और ‘तर्पण कुंड’ थे इन दोनों के बीच सन्यास यंत्र था। सन्यास यंत्र के ऊपर दूसरा सन्यास यंत्र लटकाया गया था। यह लटकाया गया यंत्र लकड़ी का बना था और गोल आकार का था। इसके दोनों पृष्ठों में ‘टांकरी लिपि’ में मंत्र लिखे गए थे।
इस पूरी व्यवस्था के बगल में लाल रंग के कपड़े का प्रयोग करके एक स्थान को बंद किया गया था। इस स्थान पर सन्यास दीक्षा की प्रक्रिया संपन्न होनी थी। सन्यास दीक्षा की प्रक्रिया का पहला हिस्सा कर्मकांड पर आधारित था। महायोगी योगेंदर नाथ पूर्ण राजसिक पहनावा पहनकर इस दीक्षा प्रक्रिया में शामिल हुए क्योंकि ‘कौल सिद्ध धर्म’ के अनुसार ‘संन्यास दीक्षा’ के अवसर पर इसी तरह के राजसिक वस्त्र पहनने का विधान है। शुरुआती कर्मकांड और पूजन के बाद ‘महायोगी योगेंदर नाथ’ ने लाल रंग के कपड़े से ढके हुए स्थान में प्रवेश किया।
यह लाल रंग का पर्दा हल्का पारदर्शी था और इसके अंदर सन्यास यंत्र को देखा जा सकता था। वहां हमें पता चला कि यह संन्यास यंत्र ‘संहार यंत्र’ है और क्योंकि ‘महायोगी योगेंदर नाथ’ ‘कौल संहार सन्यास दीक्षा ले रहे थे इसलिए संहार यंत्र को वहां रखा गया था। संहार क्रम से सन्यास को शिव का मार्ग माना जाता है। संन्यास के बाद एक होम और हवन का क्रम रखा गया, जिसके बाद सन्यास दीक्षा पूर्ण हो गई।


यह पूरा का पूरा दीक्षा सत्र कुछ घंटों तक चला। दीक्षा के पूर्ण होने के उपरांत महायोगी योगेंदर नाथ का जीवन एक पूर्णतः अलग रास्ते पर चल पड़ा है क्योंकि उन्होंने जो संहार दीक्षा ली है वह बहुत असाधारण है और बहुत विरले साधकों को ही मिल पाती है। इस साधना दीक्षा को लेने का अधिकार केवल उसी व्यक्ति को होता है जो गुरु की दृष्टि में पात्र होता है। साथ ही वह बाह्य संसार और समाज में सफल जीवन जीकर आया होता है। ऐसा व्यक्ति निश्चय ही सौभाग्यशाली होता है। महायोगी योगेंदर नाथ ने संन्यास के लिए आवश्यक इन सभी मानदंडों को पूरा किया था। इस संन्यास दीक्षा के सफलतापूर्वक समापन के बाद वह एक सामान्य साधक से ऊपर उठकर ‘कौल सिद्ध धर्म’ के एक सन्यासी हो गए हैं।
बाद में उनसे बातचीत के दौरान हमने उनसे अचानक संन्यास के फैसले के बारे में पूछा क्योंकि यह निर्णय जीवन के कुछ चरम निर्णयों में से एक गिना जाता है। साथ ही युवावस्था में संन्यास का निर्णय लेना भी जीवन में एक बड़ी उपलब्धि है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि संन्यास का फैसला उन्होंने अचानक नहीं लिया बल्कि वे सदैव से इस मार्ग पर चलने के इच्छुक थे और कौलनतक पीठ की गुरु शिष्य परंपरा और महासिद्ध इशपुत्र के द्वारा मानवता की भलाई के लिए किए जा रहे अनवरत प्रयासों से प्रभावित होकर उनके इस उदेश्य में योगदान देने की इच्छा से ही सन्यास के लिए वे प्रेरित हुए। कौल सिद्ध सन्यास अन्य संप्रदायों में दिए जाने वाले सन्यास से अलग है क्योंकि अन्य संप्रदायों में दिया जाने वाला सन्यास तंत्र में नहीं बल्कि ‘परित्याग’ या ‘वैराग्य’ पर केंद्रित होता है। ‘कौल सिद्ध सन्यास’ ब्रह्मांड और उसकी गति पर आधारित होता है, कौल सिद्ध संन्यासी उच्च सद्गुणों को अपने अंदर धारण करता है और उन्हीं के अनुसार इस सृष्टि की उन्नति के लिए अपना जीवन जीता है।

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