कौलान्तक सिद्ध विद्या पीठ की ओर से आयोजित सात दिवसीय कोर्स में विज्ञान भैरव तंत्र पर से खुले सिद्धों के रहस्य।

विज्ञान भैरव तंत्र लम्बे समय से ध्यान विधियों के मामले में देश-विदेश के आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण ग्रन्थ रहा है। इस ग्रन्थ में बताई गई विधियां सामान्य व्यक्ति को भी समाधि की गहन गहराइयों में ले जाने सक्षम हैं।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : इंटरनेशनल कौलान्तक सिद्ध विद्या पीठ की ओर से विज्ञान भैरव तंत्र पर दिसंबर माह की 21 तारीख से लेकर 28 तारीख तक सात दिवसीय कोर्स का आयोजन किया गया। यह कोर्स कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्रनाथ जिनको पूरी दुनिया ‘ईशपुत्र’ के नाम से जानती है, के दिशानिर्देशों में संपन्न हुआ।

विज्ञान भैरव तंत्र लम्बे समय से ध्यान विधियों के मामले में देश-विदेश के आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण ग्रन्थ रहा है। इस ग्रन्थ में बताई गई विधियां सामान्य व्यक्ति को भी समाधि की गहन गहराइयों में ले जाने सक्षम हैं। इस ग्रन्थ में बताई गई विधियां तो पूर्ण हैं लेकिन वे सूत्र के रूप में हैं, और एक सामान्य व्यक्ति के लिए इन विधियों को सही तरीके से समझकर समाधिगत हो पाना लगभग असंभव है। इन विधियों को केवल वे गुरु ही समझा सकते हैं जो स्वयं समाधि के गहनतम अनुभवों को जीकर करुणावश वापस इस संसार में लौटे हों। अध्यात्म के इस प्राचीनतम ग्रन्थ विज्ञान भैरव तंत्र का ज्ञान इस ग्रन्थ जितनी ही प्राचीन ज्ञान की परम्परा कौलान्तक पीठ की ओर से साधकों को इस कोर्स के माध्यम से दिया गया।

कौलान्तक पीठ की यह परम्परा स्वयं भगवान शिव से निकली है, और कालातीत , देवताओं, ऋषियों और सिद्धों से प्रवाहित होते हुए यह ज्ञान वर्तमान के कौलान्तक पीठाधीश्वर महासिद्ध ईशपुत्र के माध्यम से जिज्ञासु साधकों के लिए सुलभ हो पाया है। केवल तीन वर्ष की उम्र से हिमालय के गुरुओं के पास रहकर महासिद्ध ईशपुत्र ने अनेकानेक परम्पराओं का ज्ञान प्राप्त किया और जाग्रत कुण्डलिनी की शक्ति धारण करने वाले नित्य समाधिस्थ महासिद्ध बने। इसलिए जिन साधकों ने विज्ञान भैरव तंत्र का अध्ययन इस कोर्स में किया उनको इन सूत्रों की वह प्रमाणिक व्याख्या मिली जो एक समाधिस्थ चेतना ने स्वयं जाना है और जिसे समाधि का रास्ता पता है। महासिद्ध ईशपुत्र के माध्यम से विज्ञान भैरव का यह ज्ञान हिमालय की सिद्ध परम्परानुसार साधकों को दिया गया।

ध्यान विधियों का संकलन यह ग्रन्थ आखिर तंत्र क्यों कहा गया और योग क्यों नहीं यह प्रश्न अपने आप में एक ऐसा विषय है जिसको समझा पाना किसी समर्थ गुरु द्वारा ही संभव है, और फिर जब यह तंत्र ग्रन्थ है तब इस विषय से जुड़ी तांत्रिक क्रियाओं और प्रतीकों का ज्ञान भी अवश्य ही इससे जुड़ा होगा जो इस ग्रन्थ में रहस्यात्मक रूप से गायब हैं। इन सभी प्रश्नों के जवाब इस कोर्स के दौरान साधकों को महासिद्ध ईशपुत्र के माध्यम से मिले। कौलान्तक पीठ की प्राचीनतम परम्परा में विज्ञान भैरव तंत्र से जुड़े शिव के रूप और विज्ञान भैरव के यन्त्र आदि का ज्ञान पूर्ण व्याख्याओं के साथ सदा मौजूद रहा है।

इसलिए इस कोर्स के माध्यम से साधकों को विज्ञान भैरव के समाधि और कुण्डलिनी आदि से जुड़े रहस्यों की जानकारी दी गई। हालांकि सात दिन का समय इतने वृहद् विषय को समझाने के लिए बहुत कम होता है लेकिन फिर भी साधकों को इस ग्रन्थ के विषयों की पूरी आधारभूत जानकारी दी गई। विज्ञान भैरव के अध्ययन के लिए साधकों ने भी काफी उत्सुकता दिखाई। समय कम होने के कारण साधकों को चार या पांच घंटे ही सोने को मिल पाते थे और कभी-कभी तो नींद के लिए इससे भी कम समय मिल पाता था लेकिन फिर भी साधकों ने इस कोर्स के विषयों का पूरी लगन के साथ अध्ययन किया। हालांकि इस कोर्स में विज्ञान भैरव के बहुत सारे रहस्यमय पहलुओं को उजागर किया गया और सभी 112 विधियों की जानकारी परम्परानुसार दी गई लेकिन फिर भी यह बेसिक कोर्स की श्रेणी में ही गिना गया है।

विज्ञान भैरव तंत्र के इस कोर्स में विज्ञान भैरव के रहस्यमय स्वरुप, यन्त्र और विधियों का ज्ञान दिया गया। अनेकानेक ध्यान-धारणाएँ जो विज्ञान भैरव के साथ गहनता के साथ जुड़ी हैं और विज्ञान भैरव के यंत्र का अर्थ पूर्ण व्याख्या सहित साधकों के सम्मुख इस कोर्स में रखा गया। इन सबके साथ विज्ञान भैरव के इस ज्ञान की उत्पत्ति और इस ग्रन्थ का वृहद दर्शन साधकों को बताया गया ताकि इस ग्रन्थ से सम्बंधित एक प्रमाणिक समझ साधकों के अन्दर विकसित हो सके।


साधकों के अन्दर उठ रहे विषय से सम्बंधित प्रश्नों के समाधान प्रमाणिकता से हो सकें इसलिए महासिद्ध ईशपुत्र ने स्वयं प्रतिदिन साधकों के साथ बैठकर उनके साथ चर्चा की और प्रश्नोत्तरों के माध्यम से उनकी जिज्ञासाओं को शांत किया। महासिद्ध के साथ इन प्रश्नोत्तरों के दौरान साधकों को विज्ञान भैरव के अलावा जीवन के प्रति भी एक नूतन द्रष्टि प्राप्त हुई क्योंकि नित्य समाधिस्थ महासिद्ध की उपस्थिति मात्र ही क्रांतिकारी होती है।

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