अमेरिका ने चीन पर लगाए आरोप ,कर रहा अंतरराष्ट्रीय नियमों और जिबूती के कानून का उल्लंघन

(एनएलएन मीडिया-न्यूज़ लाइव नाऊ) : दक्षिण चीन सागर में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती तनातनी के बाद अब ऐसा ही कुछ अफ्रीका के जिबूती में भी देखने को मिल रहा है। इसकी वजह बनी है अमेरिकी वायुसेना के विमान पर छोड़ी गई लेजर बीम। इसकी वजह से विमान का पायलट घायल हो गया। अमेरिका ने इसको लेकर चीन पर सीधा आरोप लगाया है। अमेरिका का साफतौर पर कहना है कि यह काम चीन के अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता है। आपको बता दें कि चीन और अमेरिका दोनों का ही जिबूती में मिलिट्री बेस है। चीन ने पिछले वर्ष जुलाई में अपने मिलिट्री बेस की यहां पर शुरुआत की है जबकि अमेरिका इससे पहले से ही यहां पर है। यहां पर जापान का भी एक मिलिट्री बेस मौजूद है। लेकिन जिस तरह के आरोप अमेरिका ने चीन पर लगाए हैं वह इस लिहाज से भी काफी गंभीर हैं क्‍योंकि लेजर बीम बेहद खतरनाक हथियार माना जाता है।अफ्रीका महाद्वीप के मुहाने पर स्थित जिबूती में अमेरिका का बड़ा सैन्य अड्डा है, जहां चार हजार जवान तैनात हैं। इनमें स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप भी शामिल है। अमेरिका यहीं से यमन में चल रहे गृहयुद्ध और सोमालिया के हालात की निगरानी करता है। दोनों देशों के सैन्य अड्डों की दूरी कुछ ही किलोमीटर है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने लेजर बीम से निशाना बनाने की घटना को गंभीरता से लिया है और चीन सरकार से इसकी जांच करने के लिए कहा है। अमेरिका के मुताबिक यह घटना उस वक्‍त घटी जब अमेरिकी वायुसेना का विमान हरक्‍यूलिस सी 130 हवाई अडडे पर उतर रहा था। उसी वक्‍त विमान को निशाना बनाया गया जिसकी वजह से पायलट की आंखें खराब हो गईं हो वह जख्‍मी भी हो गया। अमेरिका ने यहां तक आरोप लगाया है कि यह घटना पहली बार नहीं घटी है बल्कि इस तरह की घटना चीन के यहां पर मिलिट्री बेस बनाने के बाद से करीब दस बार हो चुकी है।वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के आरोपों को चीन ने खारिज कर दिया है। जवाब में चीन के रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है- अमेरिका के आरोप झूठे हैं। चीन की गलत तरीके से निंदा की जा रही है। चीन के लोग पूरी गंभीरता से अंतरराष्ट्रीय नियमों और जिबूती के कानून का पालन कर रहे हैं। वे क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को बनाए रखने के लिए वचनबद्ध हैं। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनिइंग ने कहा कि अमेरिकी शिकायत मिलने के बाद गंभीरता से जांच की गई, सब कुछ ठीक पाया गया। इसलिए अमेरिका का आरोप आधारहीन है।आपको बता दें कि अफ्रीका का जिबूती की स्थिति को लेकर चीन पहले से ही काफी गंभीर रहा है। इसकी स्थिति यहां पर मिलिट्री बेस बनाने के लिए काफी उपयुक्त समझी जाती है। यही वजह है कि अमेरिका ने यहां पर काफी समय पहले ही अपना मिलिट्री बेस बना लिया था। यह एक व्यस्त शिपिंग मार्ग पर पड़ने वाला देश है। इसके साथ ही अपने बाकी पड़ोसी देशों के मुकाबले यहां के राजनीतिक हालात स्थिर हैं। चीन की मानें तो यहां पर मिलिट्री बेस बनाने की वजह अफ्रीका और दक्षिण एशिया में शांति कायम करना है। इसके अलावा यहां से सैन्य सहयोग, नौसैनिक अभ्यास और बचाव मिशन के कार्य भी किए जा सकते हैं।चीन लगातार अफ्रीका में निवेश के स्तर को बढ़ा रहा है। इसके अलावा वह पिछले कुछ वर्षों से अपनी सेना के आधुनिकीकरण पर भी बहुत ध्यान दे रहा है। दरअसल, जिबूती में मिलिट्री बेस का निर्माण चीन और जिबूती के बीच हुए दोस्ताना समझौते का नतीजा है। वर्ष 2015 में अफ्रीकी राष्ट्रों के साथ हुए शिखर सम्मेलन में चीन ने अफ्रीका के विकास के लिए 60 बिलियन डॉलर निवेश करने का वादा किया था। इसके साथ ही चीन अफ्रीका महाद्वीप का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर भी बन चुका है। वहीं अफ्रीका के जरिए चीन को कई प्राकृतिक संसाधन प्राप्त हो रहे हैं।लेजर बीम को रक्षा क्षेत्र में भविष्‍य का सबसे घातक हथियार माना गया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यही होती है कि यह दिखाई नहीं देती लेकिन इसका अचूक वार किसी भी चीज को तबाह करने में कारगर होता है। अमेरिका, रूस समेत चीन के पास इस तरह की तकनीक उपलब्‍ध है। इसके अलावा भारत की यदि बात करें तो वह भी इस पर काफी समय से काम कर रहा है। लेजर गाइडेड मिसाइल कई देशों के पास पहले से ही मौजूद हैं। लेकिन लेजर बीम आधुनिक हथियारों का बेहद अलग रूप है। इसकी दूसरी बड़ी खासियत यह होती है कि इसके जरिए जमीन से हवा और हवा से जमीन पर निशाना लगाया जा सकता है। इसकी तीसरी बड़ी खासियत यह होती है कि यह दूसरे हथियारों के मुकाबले काफी किफायती हथियार भी है।अमेरिका ने इस तरह का पहला हथियार बनाया था जिसको Laser Weapon System or XN-1 LaWS का नाम दिया गया था। यह एक से दो सैकेंड के अंदर किसी भी विमान पर अचूक निशाना लगाकर उसको खाक कर सकता है। इस हथियार को अमेरिकी नौसेना ने तैयार किया है और इसको यूएसएस पोंस पर लगाया गया है। जहां तक चीन की बात है तो उसने वर्ष 2014 में इस तरह की तकनीक हासिल कर ली थी। इस तकनीक के जरिए 500 मीटर की ऊंचाई पर उड़ने वाले एयरक्राफ्ट या फिर ड्रोन को कुछ सैकेंड में खत्‍म करने में सक्षम है। समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, कम आवाज, तेज गति और अचूक निशाना इस तकनीक की खासियत है। इसे विकसित करने वाली संस्था का कहना है कि यह हथियार दो किमी के दायरे में एयरक्राफ्ट को टारगेट कर पांच सैकेंड के अंदर उसे तबाह कर सकता है।भविष्य की ऐसी ही एक हथियार प्रणाली भारत भी विकसित कर रहा है, लेकिन वो लेजर सिस्टम से बिल्कुल अलग है। इस योजना के तहत जिस वेपन को बनाने की कोशिश की जा रही है उसको काली नाम दिया गया है। काली ( KALI ) यानी Kilo Ampere Linear Injector। भविष्य में युद्ध का तौर-तरीका बदलने की ताकत रखने वाला हिंदुस्तान का ये सीक्रेट हथियार लेजर गन नहीं है। KALI- ‘Single Shot Pulsed Gigawatt Electron Accelerators’ हैं। ये एसीलिरेटर इलेक्ट्रान की ऊर्जा को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन में बदल कर हाई एनर्जी वाली तरंगों में बदल देता है।हाई एनर्जी वाली ये तरंग दुश्मन की मिसाइलों और लड़ाकू जहाजों पर बेआवाज बिजली की तरह कहर बनकर टूटेगी और पल भर में दुश्मन को जला कर खाक कर देंगी। फिलहाल इसके कुछ प्रोटोटाइप तैयार भी किए जा चुके हैं लेकिन पूरी हथियार प्रणाली का विकास अभी भी जारी है। इस हथियार को DRDO और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर मिल कर बना रहे हैं। 1985 में BARC के डायरेक्टर डॉ. आर चिदांबरम ने KALI की योजना बनाई। 1989 में प्रोजेक्ट KALI शुरू हुआ। माना जा रहा है कि प्रोजेक्ट काली सफल हो गया तो वाटर फिल्ड कैपिस्टर के जरिए ऊर्जा पैदा करने वाले High-Power Microwave gun को विमानों और दूसरे प्लेटफॉर्म पर भी लगाया जा सकेगा।

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