शास्त्रार्थ बिना ही शंकराचार्य बनना कहाँ तक उचित ? जानें नियम

शंकराचार्य के रूप में अविमुक्तेश्वरानंद विवाद फिर से गरमाया

न्यूज़ लाइव नाउ टीम , उत्तराखंड : अविमुक्तेश्वरानंद की ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के रूप में नियुक्ति के साथ फिर से विवाद खड़ा हो गया। पहले शंकराचार्य की शिक्षाओं-दीक्षाओं के लिए कड़े नियम व शास्त्रार्थ की व्यवस्था थी । परन्तु आज के परिवेश में कोई भी व्यक्ति खुद को ही स्वयं शंकराचार्य की उपाधि दे देता है या अपने ही किसी शिष्य को इस पद पर नियुक्त कर देता है।

पौराणिक ग्रंथ के अनुसार शंकराचार्य की पदवी हेतु एक वृहद शास्त्रार्थ का आयोजन किया जाता था जिसमें सभी अखाड़ों के प्रमुख, अखाड़ों के आचार्य, महामंडलेश्वर और संत शामिल होते थे। शास्त्रार्थ में विजेता को शंकराचार्य चुना जाता था। कालांतर में धीरे-धीरे ये प्रथा आज के परिवेश में लगभग समाप्त हो चुकी है आज तो स्वयं शंकराचार्य ही बिना किसी नियम कायदे के अयोग्य व्यक्ति को भी उत्तराधिकारी बनाने में संकोच नहीं करते । वर्तमान में अखाड़ों और काशी विद्वत परिषद की भूमिका नगण्य हो गयी है। विद्वान् बताते हैं कि शंकराचार्य ने निम्न चार पीठों की स्थापना की थी (१) ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, (२) श्रृंगेरी पीठ, (३) द्वारिका शारदा पीठ और (४) पुरी गोवर्धन पीठ जिनके आधार पर शास्त्रार्थ होता था और तब योग्य शिष्य को शंकराचार्य घोषित किया जाता था।

शंकराचार्य बनने के लिए सन्यासी और ब्राह्मण होना आवश्यक है। वह वेदों और वेदांगों का ज्ञाता हो। संन्यासी दंड धारण करने वाला हो, इंद्रियों पर उसका नियंत्रण हो और तन- मन से वह पवित्र होना चाहिए । अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों तथा प्रसिद्ध संतों की सभाओं की अनुमति होनी चाहिए अंत में जब काशी विद्वत परिषद अपनी सहमति की मुहर लगा देता था तब कहीं जाकर शंकराचार्य की उपाधि मिलती थी ।

काशी विद्वत परिषद का दावा :1941 में जब ब्रह्मानंद को ज्योतिष पीठ द्वारा शंकराचार्य बनाया गया, तब अखाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका थी । ब्रह्मलीन शंकराचार्य ने कहा था की किसी के उत्तराधिकारी बनाने से कोई शंकराचार्य नहीं बन जाता

महंत रवींद्र पुरी जो निरंजनी अखाड़े के सचिव है,उन्होंने शंकराचार्य के रूप में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति का विरोध करते हुए कहा है कि नियुक्ति में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है.

उधर अविमुक्तेश्वरानंद के गुरुभाई स्वामी सुबोधानंद का यह बयान है की ,शंकराचार्य की नियुक्ति को लेकर अखाड़ा परिषद को कोई हक नहीं है और शंकराचार्य की नियुक्ति को लेकर अखाड़ा परिषद की कोई भी बात वह नहीं मानने वाले । उन्होंने कहा की ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद को 12 सितंबर को भू-समाधि देने से पूर्व ही ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और द्वारका पीठ पर स्वामी सदानंद का पट्टाभिषेक कर दिया गया था ।

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