विपक्षी गठबंधन का समर्थन करने और PM ओली की सरकार गिराने के आरोपी CPN-UML के 11 सांसद निष्कासित ।

पीएम ओली पर संवैधानिक परिषद अधिनियम से संबंधित एक अध्यादेश को वापस लेने का दबाव था। मंगलवार को जारी इस अध्यादेश को राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने भी मंजूरी दे दी थी।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ): नेपाल में राजनीतिक माहौल गरम है। नेपाल में सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-यूनिफाइड मार्कसिस्ट लेनिनिस्ट (सीपीएन-यूएमएल) ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली नीत सरकार गिराने की कोशिश में विपक्षी गठबंधन को समर्थन देने के लिये सोमवार को अपने 11 सांसदों को निष्कासित कर दिया। सीपीएन-यूएमएल की स्थायी समिति ने सोमवार को यहां हुई एक बैठक के दौरान पूर्व प्रधानमंत्रियों माधव कुमार नेपाल तथा झालानाथ खनल समेत सांसदों के खिलाफ कार्रवाई का निर्णय लिया।
ओली सरकार को गिराने के लिये विपक्षी दलों का साथ देने के आरोपी निष्कासित सांसद अब पार्टी के महासचिव भी नहीं रह जाएंगे। इन सांसदों को सोमवार सुबह तक स्पष्टीकरण देने का समय दिया गया था, जिसके पूरा होने के बाद उन्हें निष्कासित कर दिया गया।
ओली की सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने ही कैबिनेट के इस फैसले का विरोध किया है। पार्टी के प्रवक्ता नारायणजी श्रेष्ठ ने कहा कि यह निर्णय जल्दबाजी में किया गया है क्योंकि आज सुबह कैबिनेट की बैठक में सभी मंत्री उपस्थित नहीं थे। यह लोकतांत्रिक मानदंडों के खिलाफ है और राष्ट्र को पीछे ले जाएगा। इसे लागू नहीं किया जा सकता।
पीएम ओली पर संवैधानिक परिषद अधिनियम से संबंधित एक अध्यादेश को वापस लेने का दबाव था। मंगलवार को जारी इस अध्यादेश को राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने भी मंजूरी दे दी थी। इसे लेकर पीएम ओली ने कल पार्टी के चेयरमैन पुष्प कमल दहल प्रचंड, दोपहर में सचिवालय के सदस्य राम बहादुर थापा और शाम को राष्ट्रपति भंडारी के साथ कई दौर की बैठक की थी। माना जा रहा है कि अध्यादेश को वापस लेने पर अड़े विपक्ष के साथ सहमति नहीं बनने के बाद बेइज्जती से बचने के लिए उन्होंने संसद भंग करने का फैसला किया है।
पीएम ओली का कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन पुष्प कमल दहल प्रचंड के साथ कई मुद्दों पर विवाद था। दोनों नेताओं के बीच पार्टी की पहल पर पहले एक बार समझौता भी हुआ था। लेकिन, बाद में मंत्रिमंडल के बंटवारे को लेकर फिर से खींचतान शुरू हो गई थी। ओली ने अक्टूबर में बिना प्रचंड की सहमति के अपनी कैबिनेट में फेरबदल किया था। उन्होंने पार्टी के अंदर और बाहर की कई समितियों में अन्य नेताओं से बातचीत किए बगैर ही कई लोगों को नियुक्त किया था। दोनों नेताओं के बीच मंत्रिमंडल में पदों के अलावा, राजदूतों और विभिन्न संवैधानिक और अन्य पदों पर नियुक्ति को लेकर दोनों गुटों के बीच सहमति नहीं बनी थी।
पीएम ओली अपने कैबिनेट के कुछ नेताओं का पोर्टफोलियो बदलने के साथ उन्हें फिर से मंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन प्रचंड इसके सख्त खिलाफ थे। प्रचंड चाहते थे कि देश के गृहमंत्री का पद जनार्दन शर्मा को दिया जाए। इसके अलावा दहल चाहते हैं कि संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय भी उनके किसी खास नेता को सौंपा जाए।
नेपाल की प्रमुख विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस भी संसद के शीतकालीन सत्र को जल्द से जल्द बुलाने की मांग कर रही थी। उनका कहना था कि इससे देश में कोरोना वायरस को लेकर पैदा हुई स्थिति पर बहस की जा सकेगी। वहीं, पीएम ओली के करीबियों को अंदेशा था कि इस सत्र को नेपाली कांग्रेस साजिश के तहत बुला रही है। उनका असली मकसद सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के बागी नेताओं के साथ मिलकर ओली सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करना है। जिससे ओली को सत्ता से बाहर किया जा सके।
ओली और प्रचंड के बीच जारी विवाद से सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अस्तित्व के ऊपर ही खतरा मंडराने लगा था। वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे बिष्णु प्रसाद पौडेल समेत कई नेताओं ने खुलेआम कहा था कि उनकी पार्टी में जल्द ही बंटवारा हो सकता है। ऐसी स्थिति में ओली सरकार को गिरती ही, पार्टी की एकता भी खत्म हो जाती। इसका सीधा नुकसान आगामी लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ता। माना जा रहा है कि इन्ही कारणों से पीएम ओली ने संसद को भंग करने का निर्णय लिया है।
‘द हिमालियन टाइम्स’ की खबर के अनुसार सांसदों ने पार्टी के खिलाफ जाने और विपक्षी गठबंधन को समर्थन देने के फैसले पर समिति को स्पष्टीकरण देने से इनकार कर दिया।
प्रधानमंत्री ओली द्वारा पेश किये गए निष्कासन प्रस्ताव को सत्तारूढ़ दल में टूट की आधिकारिक शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। ओली ने नेपाल-खनल धड़े के 12 और नेताओं को 24 घंटे का अल्टीमेटम देकर विपक्षी गठबंधन को समर्थन देने पर स्पष्टीकरण मांगा है।फिलहाल नेपाल के राजनीतिक उठापटक में भारत सहित अन्य पड़ोसी देशों की नजर है।

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