आईएमए का सांप्रदायिक दोगलापन !

'हिन्दू' स्वामी रामदेव से सवाल, 'मुस्लिम' हमदर्द के मालिक अब्दुल मजीद पर चुप्पी |

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ):हर्ष पाण्डेय (प्रयाग राज )-

पिछले एक हफ्ते से अधिक की समय अवधि में कोरोना महामारी जैसे विकराल संकट के बीच सनातन मानव सभ्यता की प्राचीनतम चिकित्सा पद्यति आयुर्वेद पाश्चात की नवीनतम चिकित्सा पद्यति ऐलोपैथी आमने-सामने आ चुकी है। इस टकराव की धुरी वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर नहीं बल्कि संस्थागत एवं घोर सांप्रदायिक पृष्ठ्भूमि पर टिकी है।

आईएमए के अध्यक्ष डॉ जॉन ऑस्टिन जयलाल खुद कोरोना महामारी को ईसाह मसीह के चमत्कार एवं कृपा से जोड़ते हुए डॉक्टर का सफ़ेद कोट पहने चर्च एजेंट के तौर पर ईसाइयत का प्रचार कर रहे है जबकि उनकी मेडिकल ब्रांच ऐलोपैथी खुद किसी भी धर्म या मज़हब से खुद से न जोड़ते हुए विशुद्ध वैज्ञानिक होने का दावा करती है। तो एक गैर-धार्मिक चिकित्सा संसथान का प्रमुख होकर ऐसा वक्तव्य देना उचित कैसे हो सकता है ? उन्हें हक़ है खुद को एक डॉक्टर बोलने का ?

यह बात केवल एक डॉ जॉन ऑस्टिन जयलाल की नहीं है बल्कि खुद को चिकित्सा विज्ञान का ठेकेदार करार देने वाली संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) की है। बीते अतीत में कुछ चुनिंदा डॉक्टर्स की प्राइवेट प्रॉपर्टी वाली यह विवादित संस्था मेडिकल की बजाय मार्केटिंग एसोसिएशन के तौर पर काम करती नज़र आई है और एक इलेक्ट्रिक बल्ब से लेकर वॉल पेंट जैसे प्रोडक्ट्स को प्रमाणित कर चुकी है।

खुद व्यापारिक एवं मज़हबी पहचान और कारनामों वाली आईएमए और इसके सरदार डॉ जॉन को केवल सेवाभाव से राष्ट्र के प्रति समर्पित सनातनी भगवाधारी स्वामी रामदेव और उनकी संस्था पतंजलि से समस्या उत्पन्न होती और वह उन्ही पर सवाल खड़े कर देती है क्योंकि वह हिन्दू है और वह उसकी ऐलोपैथी बाजार की जगह आयुर्वेद का समवेशी तंत्र स्थापित कर रहे है वह भी ‘सवर्जन हिताय सवर्जन सुखाय’ की मार्ग रुपी नीति पर प्रशस्त होकर।

वह खुद सफ़ेद लिबाज़ पहन खुद को छद्म वैज्ञानिक प्रतिनिधि बताकर ईसाइयत का खुला प्रचार कर सकते लेकिन किसी मीडिया में मजाल है कि उनसे सवाल कर लें ? वह छुप कर अपना एजेंडा साध लेते हैं तो वह सही मान लेनी चाहिए लेकिन स्वामी रामदेव खुले और वैद्य तौर पर आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार तथा व्यापार कर लें तो इन्हें चुभन होने लगती है क्योंकि चिकित्सा जगत में इनकी मठाधीशी खतरे में आ जाती है।

फिर भी यदि एक क्षण के लिए आईएमए को ही प्रामाणिक, प्रभावकारी तथा सत्यवादी मान लिया जाए तो भी तर्क की कसौटी पर एक सवाल तो उन खड़ा हो ही जाता है जिसका जवाब देना उनकी औकात और हिम्मत के दायरे से बाहर है।

मुस्लिम मज़हब और यूनानी चिकित्सा से ताल्लुक रखने वाली हमदर्द कंपनी तथा उसके मौजूदा मालिक
अब्दुल मजीद से कभी सवाल करने की हिम्मत या रूचि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अंदर क्यों नहीं आई ? डॉ जॉन ऑस्टिन जयलाल को हमदर्द की यूनानी चिकित्सा पद्यति से कोई एतराज नहीं है ? यदि हाँ तो आयुर्वेद के प्रति ऐसी हीं भावना क्यों ? इसका उत्तर वह कभी नहीं दे पाएंगे इसलिए स्वामी रामदेव की प्रशोत्तरी का जवाब देने की जगह उल्टा उन पर मानहानि का केस कर डाला लेकिन उल्टा डॉ साहब को दिल्ली हाईकोर्ट से समन भेज दिया गया है और अब उन्हीं की संस्था में विरोध की प्रतिध्वनि उजागर हो रही है।

अंततः प्रश्न वही रही रह जाता है कि आखिर ऐलोपैथी की पुरोधा आईएमए को आयुर्वेद की अलख जगाने वाली पतंजलि आयुर्वेद और उसके संचालक स्वामी रामदेव से दिक्कत, नफरत क्यों है ? और यूनानी पद्यति वाली हमदर्द और उसके मालिक अब्दुल मजीद से सवाल करने की जगह वह चुप्पी साध लेती है ?

इसका जवाब धर्म बनाम मज़हब के बीच की बारीक़ लकीर में है। अब्राहमिक मज़हबों – ईसाइयत और इस्लाम में अघोषित समन्वय ऐलोपैथी और यूनानी में भिन्नता को भी मिटा देता है क्योंकि तब उसके सामने सत्य सनातन धर्म और उसकी चिकित्सा पद्यति आयुर्वेद खड़ी हो जाती है और यही कारण है कि ऐसे प्रकरणों में आईएमए का साम्प्रदयिक दोगलापन उद्घाटित हो जाता है जो स्वाभाव से केवल सनातन विरोधी है और कुछ नहीं, यही खरा सत्य है।

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