अर्नब के वकील की सुप्रीम कोर्ट में दलील, तो क्या सीएम या जज को गिरफ्तार करना चाहिए

साल्वे ने कहा, पिछले दिनों महाराष्ट्र में एक व्यक्ति ने यह कहकर आत्महत्या कर ली कि मुख्यमंत्री वेतन देने में असफल रहे, तो क्या मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट में रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी मामले में सुनवाई के दौरान उनके वकील हरीश साल्वे ने कहा, उनके मुवक्किल पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं बनता। साल्वे ने कहा, पिछले दिनों महाराष्ट्र में एक व्यक्ति ने यह कहकर आत्महत्या कर ली कि मुख्यमंत्री वेतन देने में असफल रहे, तो क्या मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करना चाहिए? एक अन्य आरोपी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा, अगर कोई इस बात से नाराज होकर आत्महत्या कर ले कि हाईकोर्ट ने उसके मामले पर 10 वर्ष सुनवाई नहीं की तो क्या जज को गिरफ्तार करना चाहिए?  जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की पीठ के समक्ष साल्वे ने राज्य सरकार द्वारा गोस्वामी के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई करने का आरोप लगाया। साल्वे और रोहतगी ने कहा, उनके मुवक्किलों के खिलाफ कार्रवाई अनुचित और गैरकानूनी है।इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट अदालत द्वारा स्वीकार किए जाने के बावजूद पुलिस के गिरफ्तारी की। साल्वे ने कहा, आप तीन साल पुरानी एफआईआर में किसी को गिरफ्तार करते हैं और उसे दिवाली के सप्ताह जेल में डाल देते हैं। फिर उसे खूंखार अपराधियों के साथ तलोजा जेल में भेज दिया जाता है। उन्होंने कहा कि अर्नब को गिरफ्तार करने के लिए दो दर्जन से ज्यादा हथियारबंद पुलिसकर्मी पहुंचे थे? क्या अर्नब आतंकवादी हैं? आपको चैनल नहीं पसंद तो मत देखिए जस्टिस चंद्रचूड़ ने भी पूछा, अगर कोई व्यक्ति वित्तीय तनाव या उधारकर्ता द्वारा उधार देने से मना करने की स्थिति में आत्महत्या करता है तो ऐसे में आखिरकार आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला कैसे बनता है? पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल से कहा, उनकी जो भी विचारधारा हो, कम से कम मैं तो उनका (अर्नब) चैनल नहीं देखता, लेकिन क्या राज्य किसी व्यक्ति को इस तरीके से निशाना बना सकते हैं? अगर आप उनका चैनल नहीं पसंद करते हैं तो उसे मत देखिए। मैं भी किताबें पढ़ना अधिक उचित समझता हूं, लेकिन सवाल यह है कि क्या राज्य किसी व्यक्ति या उसकी स्वतंत्रता को निशाना बना सकता है? हमारा लोकतंत्र बेहद मजबूत है और सरकार को ऐसी चीजों को नजरअंदाज करना चाहिए। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, यह आतंकवाद का मामला नहीं है। पीड़ित परिवार के बारे में भी सोचे कोर्ट महाराष्ट्र पुलिस की ओर से पेश वकील अमित देसाई ने कहा, अदालत को उस परिवार के बारे में सोचना चाहिए जिसने अपने परिजनों को खोया है। पुलिस तय प्रक्रिया के तहत कार्यवाही कर रही है। देसाई ने कहा, रोज हजारों की संख्या ने एफआईआर निरस्त करने की याचिका दायर की जाती है लेकिन उनमें से कितने मामलों में कोर्ट उस याचिका को जमानत याचिका में तब्दील करता है? वहीं, साल्वे और रोहतगी ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा, जब किसी मामले में क्लोजर रिपोर्ट अदालत स्वीकार कर ले तो अदालत के निर्देश के बगैर उसकी जांच नहीं की जा सकती। महाराष्ट्र सरकार ने खुद इस मामले में जांच करने का निर्णय लिया जो गैरकानूनी है।

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