चीन के हर प्रकार के दबाव का भारत ने दमदार तरीक़े से दिया जवाब, पीछे हटी पीएलए।

सत्ताधारी दल के दो सांसदों के ताईवान राष्ट्रपति के शपथ समारोह में शामिल होने पर भी चीन ने आपत्ति जताई थी।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : ओम तिवारी : चीन की ओर से भारत के ऊपर कई तरीक़े से दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। चीन द्वारा व्यापार, कूटनीति और सैन्य आक्रामकता किसी भी मोर्चे पर भारत चीन से नही झुकेगा। चीन को हर मोर्चे पर उसी की भाषा मे जवाब देने की तैयारी की गई है। कूटनीतिक स्तर पर ताइवान और हांगकांग में फंसा चीन भारत से ‘वन चाइना पॉलिसी’ पर ठोस आश्वासन चाहता है। ताइवान के मुद्दे पर अमेरिकी रुख को भारत का परोक्ष समर्थन चीन को नागवार लगा है। लेकिन भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अगर चीन को भारत की संवेदनशीलता का भी ध्यान रखना चाहिए। सत्ताधारी दल के दो सांसदों के ताईवान राष्ट्रपति के शपथ समारोह में शामिल होने पर भी चीन ने आपत्ति जताई थी। मीनाक्षी लेखी और राहुल कासवान ताइवान के राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन के शपथ ग्रहण समारोह में वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए थे। दिल्ली में चीनी दूतावास के काउंसलर लियू बिंग ने समारोह में भारत की भागीदारी के खिलाफ विरोध दर्ज कराया। इसके लिए उन्होंने सांसद लेखी और कासवान के सामने लिखित शिकायत भी दी, जिसमें उन्होंने दोनों सांसदों की तरफ से दिए गए बधाई संदेश को गलत बताया है। इस कार्यक्रम में अमेरिकी विदेश मंत्री सहित दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। सूत्रों ने कहा चीन को व्यापारिक मोर्चे पर झटका लग रहा है। चीन से विदेशी कंपनियां हटना चाहती हैं। कोविड संकट में सार्थक भूमिका की वजह से ताइवान को काफी समर्थन मिला है, जबकि चीन को दुनिया संदेह की नजर से देख रही है। भारत की भूमिका संकट के वक्त बढ़ी है। अमेरिका और भारत की रणनीतिक साझेदारी भी स्पष्ट नजर आई है। इन सबसे चीनी शासन में झुंझलाहट है। सूत्रों का कहना है कि कई मोर्चो पर उलझा चीन अपने खिलाफ बने माहौल से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा है। गालवां घाटी में चीन के कदम को भारत चीन की बौखलाहट से जोड़कर देख रहा है। सूत्रों का कहना है कि इस इलाके में कभी भी चीन ने इस तरह का आक्रामक रुख नहीं दिखाया। इसलिए माना जा रहा है कि चीन जानबूझकर दबाव बनाने के लिए इस तरह का कदम उठा रहा है। जिससे वह व्यापार के मोर्चे पर भारत पर दबाव बना सके। साथ ही अमेरिका सहित अन्य देशों की रणनीतिक मोर्चेबंदी से भारत को दूर किया जा सके। इस तरीक़े से चीन दुनिया में अपनी ख़राब होती छवि को सही करने के बजाय दादागिरी से अपना काम निकलना चाह रहा है लेकिन भारत की ओर से आक्रामकता का जवाब आक्रामकता से ही मिलेगा।

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