अर्ध-नारीश्वर से जुड़े रहस्य और साधना पद्धति की भैरव-भैरवियों ने ली शिक्षा।

हिमालय स्थित असंख्य कुलों की शिरोमणि पीठ कौलान्तक पीठ में तो इस ज्ञान को इतना बड़ा महत्व दिया गया कि परम्परा अनुसार कौलान्तक पीठ के सभी पीठाधीश्वरों को अर्धनारीश्वर साधना का ज्ञान होना आवश्यक कर दिया गया था।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव  नाऊ) : इंटरनेशनल कौलान्तक सिद्ध विद्या पीठ की ओर से 20 और  21 फरवरी को भगवान अर्ध-नारीश्वर की साधना की शिक्षा-दीक्षा पर दो दिवसीय शिविर का आयोजन किया गया था। यह शिविर कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्रनाथ जिनको पूरी दुनिया ‘ईशपुत्र’ के नाम से जानती है, के दिशानिर्देशों में संपन्न हुआ।
भगवान अर्ध-नारीश्वर पर यह शिविर महाशिवरात्रि के अवसर पर होने से साधकों के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर बन गया। महाशिवरात्रि में भगवान शिव के रुद्राभिषेक के साथ इस प्राचीन और सिद्ध विद्या का ज्ञान जिज्ञासु साधकों को दिया गया।
भगवान अर्धनारीश्वर महादेव के एक स्वरुप हैं।

इस स्वरूप में महादेव का आधा शरीर उनका है और बाक़ी का आधा शरीर उनकी अर्धांगिनी देवी पार्वती का है। यह स्वरूप अपने आप में सृष्टि के सबसे महत्वपूर्ण रहस्यों का ज्ञान अपने अन्दर समेटे हुए है।
वर्तमान में हिन्दू धर्म के अनुयायियों के बीच भगवान अर्धनारीश्वर के विषय में बहुत कम ज्ञान बचा है। इसके पीछे कारण यह रहा की भगवान शिव का यह स्वरुप एक रहस्य स्वरूप है जो सिद्धों के ज्ञान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। प्राचीन समय में इस स्वरुप का विस्तृत ज्ञान तंत्र के असंख्य कुलों मे फैला हुआ था। लेकिन समय के साथ बाह्य आक्रमणकारियों और भक्ति काल के  कारण तंत्र का ज्ञान समाज से लगभग लुप्त हो गया। तंत्र ज्ञान के लुप्त होने के साथ ही अर्धनारीश्वर की प्रमाणिक साधनाओं का ज्ञान भी लुप्त हो गया।
लेकिन मुस्लिम आक्रमणकारियों  द्वारा नष्ट किए गए अर्धनारीश्वर के मंदिरों और जलाए गए पुस्तकालयों के बावजूद हिमालय के सिद्धों ने इस ज्ञान को अपने पास सुरक्षित रखा। हिमालय स्थित असंख्य कुलों की शिरोमणि पीठ कौलान्तक पीठ में तो इस ज्ञान को इतना बड़ा महत्व दिया गया कि परम्परा अनुसार कौलान्तक पीठ के सभी पीठाधीश्वरों को अर्धनारीश्वर साधना का ज्ञान होना आवश्यक कर दिया गया था। यही कारण रहा कि कौल-कुल में भगवान अर्धनारीश्वर का ज्ञान प्रमाणिक ढंग से बचा रहा, लेकिन बाक़ी अन्य स्थानों से यह लुप्त ही हो गया।
प्राचीन कथा के अनुसार भगवान शिव के वाहन भगवान नंदी ने भगवान शिव द्वारा आगम से आए इस ज्ञान को आगे बढ़ाया और अर्धनारीश्वर ज्ञान कुल के सर्वोच्च गुरु बने। अर्धनारीश्वर के ज्ञान के विषय में बताया गया कि शिव और शक्ति से जुड़े जितने भी तंत्र के कुल उत्पन्न हुए हैं उनके मूल में अर्धनारीश्वर कुल ही है। ज्ञान का ऐसा महासागर अर्धनारीश्वर कुल जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि का ज्ञान समाहित था वह स्वयं ही विलुप्ति के कगार पर खड़ा  हुआ है। ऐसे में कौलान्तक पीठाधीश्वर महासिद्ध ईशपुत्र ने इस ज्ञान को फिर से समाज तक पहुंचाया।

अर्धनारीश्वर कुल से सम्बद्ध सैकड़ों ऐसे कुल हैं जिनका ज्ञान होने के बाद ही विराट अर्धनारीश्वर कुल के संबंध में आधारभूत समझ विकसित की जा सकती है। अर्धनारीश्वर कुल से उत्पन्न ये कुल अपने आप में पूरे ज्ञान के माहासागर हैं जिनका तो नाम तक आज समाज में उपलब्ध नहीं है, लेकिन सिद्धों  के पास सुरक्षित इस ज्ञान को समाज में फिर से देने के लिए महासिद्ध ईशपुत्र ने एक शुरुआत की है।
वर्तमान समय में हिन्दू धर्म के विराट ज्ञान का अंशमात्र ही समाज में है लेकिन सिद्धों के पास वह ज्ञान अभी भी सुरक्षित है जिससे असंख्य पुस्तकालय खड़े हो जाएं। ज्ञान के प्यासे ऐसे साधक जिन्हें अपनी विरासत पर प्रेम और गर्व है उन्हें ऐसे सिद्ध ज्ञान को सीखने और धरोहरों की भांति संजोने के लिए स्वयं आगे बढना होता है।
अर्धनारीश्वर इस विराट सृष्टि को अभिव्यक्त करने वाला स्वरुप है। अर्धनारीश्वर के शरीर के आधे हिस्से में स्थित शिव इस सृष्टि की अनाभिव्यक्त आत्मा हैं और बाक़ी के आधे हिस्से में स्थित उनकी शक्ति देवी पार्वती यह सम्पूर्ण सृष्टि रूपी अभिव्यक्त माया हैं। माया स्वरूपिणी देवी इस सृष्टि के प्रत्येक अभिव्यक्त हिस्से को बनाने वाली हैं।
शिव पार्वती के इस संयुक्त स्वरूप की साधना साधक को मोक्ष स्वरूप शिव और और सृष्टि स्वरूपिणी देवी शक्ति का सम्पूर्ण ज्ञान देती है। अर्धनारीश्वर का साधक सृष्टि के उत्पन्न होने से लेकर विनष्ट होने तक के सम्पूर्ण ज्ञान को धारण करने वाला हो जाता है।
साधना शिविर के पहले दिन अर्धनारीश्वर के स्वरूप की विस्तृत व्याख्या और उनके दर्शन के विषय में साधकों को समझाया गया। जिसमें सिद्ध परम्परानुसार शिव के अर्धनारीश्वर  स्वरूप की उत्पत्ति और यंत्र की व्याख्या की गयी। साथ ही अर्धनारीश्वर से जुड़े अनेकानेक धारणा और ध्यान विधियों को प्रयोगात्मक रूप से सिखाया गया। शिविर के दूसरे दिन हिमालय की सिद्ध परम्परा के अनुसार भगवान अर्धनारीश्वर की साधना से जुड़े कर्मकाण्ड को प्रयोगात्मक रूप से साधकों को सिखाया गया। साथ ही शिविर के दूसरे दिन महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर सिद्ध परम्परानुसार साधकों ने भगवान शिव का रुद्राभिषेक किया। भगवान अर्धनारीश्वर से जुड़ा शक्ति तत्व कलाओं का प्रतीक है इसलिए इस अवसर पर आए साधकों ने कौलान्तक सिद्ध विद्या पीठ के गंधर्व मंच पर अपनी कलाओं का प्रदर्शन किया। इस शिविर के दौरान महासिद्ध ईशपुत्र ने साधकों के समक्ष उपस्थित होकर उनको  सिद्ध परम्परानुसार अर्धनारीश्वर का ज्ञान प्रदान किया और साधकों के मन में उपजे अनेकानेक साधना से जुड़े प्रश्नों का भी समाधान किया।

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