उग्र नरसिंह से जुड़े रहस्य और साधना पद्धति की भैरव-भैरवियों ने ली शिक्षा।

मानव जाति जब भी ऐसे बुरे समय से गुजरती है जब धर्म और संस्कृति का लोप होने लगता है तब हिमालय स्थित सिद्धों ने हमेशा से ही धर्म का पुनर्प्रसार समयानुकूल तरीके से किया है।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) :   इंटरनेशनल कौलान्तक सिद्ध विद्या पीठ की ओर से 26 और 27 जनवरी को भगवान उग्र नरसिंह की साधना की शिक्षा-दीक्षा पर दो दिवसीय शिविर का आयोजन किया गया था। यह शिविर कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्रनाथ जिनको पूरी दुनिया ‘ईशपुत्र’ के नाम से जानती है, के दिशानिर्देशों में संपन्न हुआ।
भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा और हिरण्यकश्यिपु नामक दैत्य से धर्म की रक्षा हेतु नरसिंह अवतार लिया था। पैराणिक कथा के अनुसार हिरण्यकश्यिपु द्वारा घमंड में चूर होकर खम्भे को तोड़े जाने पर जब भगवान नरसिंह जब प्रगट हुए तब वह अत्यंत क्रोधित अवस्था में थे और इसी त्रैलोक्य को अपने क्रोध में भस्म कर देने वाले भाव के साथ उन्होंने हिरण्यकश्यिपु का वध किया था। हिमालय के सिद्धों की अत्यंत गुप्त गुरुशिष्य परम्परा में सुरक्षित भगवान नरसिंह के इस उग्र स्वरुप के साधना की शिक्षा-दीक्षा इस शिविर के माध्यम से वर्तमान साधकों को प्रदान की गई।

मानव जाति जब भी ऐसे बुरे समय से गुजरती है जब धर्म और संस्कृति का लोप होने लगता है तब हिमालय स्थित सिद्धों ने हमेशा से ही धर्म का पुनर्प्रसार समयानुकूल तरीके से किया है। लगभग तीन वर्ष की उम्र से हिमालय के अनेक सिद्ध गुरुओं के पास रहकर महासिद्ध ईशपुत्र ने अनेकानेक कठोर साधनाएं कीं और चौंसठ कलाओं सहित समाधि की अवस्था प्राप्त की है। लेकिन भारत सहित सम्पूर्ण विश्व की मानव जाति के पास सिद्धों का सन्देश और लुप्त ज्ञान को पहुंचाने के करुणामय उद्देश्य से उन्होंने समाज में आना स्वीकार किया।
इसी क्रम में उग्र नरसिंह साधना भी वर्तमान समय के अनुसार अत्यंत महत्वपूर्ण विद्या है। हिरण्यकश्यिपु ने यह घोषणा की थी भगवान जैसा इस संसार में कुछ नहीं है बल्कि राजा ही समस्त प्रजा का पालन करता है और प्रजा के भोजन और जीवन की समस्त व्यवस्थाएं करता है इसलिए राजा हिरण्यकश्यिपु ही भगवान है।
ऐसे समय में पूरा शासन तंत्र, शिक्षा तंत्र, न्याय व्यवस्था आदि सब नास्तिक और धर्मविरोधी हो गए। शिक्षा तंत्र ने नास्तिकता सिखाई और कहा धर्म और भगवान जैसा कुछ नहीं होता। शासन व्यवस्था ने धार्मिक लोगों, ऋषियों, गुरुओं आदि को प्रताड़ित किया। न्याय व्यवस्था भी इन्ही अधर्मियों द्वारा बनाई गई इसलिए धर्म के पास न्याय की कोई उम्मीद भी नहीं बची।
ऐसे अन्धकार के समय में जब पूरा तंत्र ही अधर्म से भर जाता है तब समाज को भी अधर्म की वाणी ही सच लगने लगती है। लोग अपने घरों से भगवान की मूर्तियों और चित्रों को अपमानित कर फेंक देते हैं और तुच्छ राजनीति से प्रेरित हो अपने वैचारिक शासकों के मानसिक गुलाम बन जाते हैं और उनकी मूर्तियों की पूजा करने लगते हैं। या फिर उनके द्वारा बताए गए झूठ को ही भगवान बना देते हैं।
इसी घनघोर अन्धकार के समय में प्रहलाद का भी जन्म होता है। प्रहलाद कोमल हृदय भक्त हैं। उनकी दृष्टि अत्यंत सूक्ष्म है लेकिन वह बहुत कम उम्र में ही सत्य को समझ जाते हैं। प्रहलाद को पता चल जाता है कि चारो ओर अधर्म से प्रेरित झूठ का ही बोलबाला है।
ऐसे समय में धार्मिक लोगों की अत्यंत दुर्दशा हो जाती है क्योंकि उन्हें अब छुपकर रहना पड़ता है। झूठ को सच बताना पड़ता है। जीवित रहने के लिए अधर्म का आचरण करना पड़ता है। ये सब लोग भी प्रहलाद के समान ही हैं। लेकिन इनके पास भक्त प्रहलाद के समान साधना से उपजी विराट साहस स्वरूपी उग्र नरसिंह की वह शक्ति नहीं है जो उन्हें सम्पूर्ण तंत्र से लड़ने का साहस प्रदान करे।
प्रहलाद अकेले ही इस सम्पूर्ण तंत्र के ख़िलाफ़ उस राजदरबार में खड़े हो जाते हैं जहां सम्पूर्ण तंत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले राजा सहित, सभासद, सांसद, मंत्री, और न्यायव्यवस्था के प्रतिनिधि उपस्थित हैं। यहाँ वह खुल कर घोषणा करते हैं की आप सब झूठ बोल रहे हैं और आपके द्वारा स्थापित भगवान झूठा है। धर्म के पास ही एकमात्र सत्य का ज्ञान है और उसी के रास्ते से असली भगवान तक पहुंचा जा सकता है।
ऐसे में हिरण्यकश्यिपु भी वही करता है जो प्रत्येक अधर्म के प्रतिनिधि सत्य की आवाज को दबाने के लिए करते हैं। हिरण्यकश्यिपु सत्य बोलने वाले का मनोबल तोड़ने का षड्यंत्र करता है, ताकि सत्य एक मखौल बनकर रह जाए। इसलिए हिरण्यकश्यिपु प्रहलाद के मनोबल रूपी खम्भे को तोड़ता है। लेकिन ऐसे समय में प्रहलाद की विराट साधना की शक्ति उनका मनोबल टूटने नहीं देती बल्कि वह उग्र नरसिंह को मूर्तिमान कर देती है जो अपने क्रोध से सम्पूर्ण अधर्म का नाश कर देते हैं, जिसका प्रतीक भगवान नरसिंह द्वारा हिरण्यकश्यिपु का वध कर देना है।
महासिद्ध ईशपुत्र द्वारा वर्तमान में धर्म की दुर्दशा के प्रति जागरूक प्रहलाद रूपी साधकों को यह अत्यंत उच्च कोटि की साधना की शिक्षा दीक्षा-प्राचीन सिद्ध परम्परा के अनुसार दी गई। मानव कल्याण का उद्देश्य ही एकमात्र वह कारण है जिससे सिद्ध जगत को ऐसे अत्यंत गुप्त ज्ञान का उपदेश करते हैं। ऐसी साधना प्राप्त कर रहे साधकों का ह्रदय अवश्य ही धर्म पथ से अत्यंत गहनता से जुड़ा होगा।
साधना शिविर के पहले दिन उग्र नरसिंह के स्वरूप की विस्तृत व्याख्या और उनके दर्शन के विषय में साधकों को समझाया गया। जिसमें सिद्ध परम्परानुसार उग्र नरसिंह के स्वरूप और यंत्र की व्याख्या की गयी। शिविर के दूसरे दिन हिमालय की सिद्ध परम्परा के अनुसार भगवान उग्र नरसिंह की साधना से जुड़े कर्मकाण्ड को प्रयोगात्मक रूप से साधकों को सिखाया गया। शिविर के दौरान महासिद्ध ईशपुत्र साधकों के समक्ष उपस्थित हुए और उन्होंने साधकों को सिद्ध परम्परानुसार उग्र नरसिंह का ज्ञान प्रदान किया। साथ ही उन्होंने साधकों के मन में उपजे अनेकानेक साधना से जुड़े प्रश्नों का भी समाधान किया।

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