नवरात्रि 2019 : मां दुर्गा की चौथी शक्ति देवी ‘कूष्मांडा’, जानिए माता को किस प्रकार करें प्रसन्न

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होती है। मां के इस रूप को लेकर मान्यता है कि इन्होंने ही संसार की रचना की है। इन्हें दुखों को हरने वाली मां कहा जाता है। सूर्य इनका निवास स्थान माना जाता है। इसलिए माता के इस स्वरूप के पीछे सूर्य का तेज दर्शाया जाता है। इनके आठ हाथ हैं और सवारी शेर है। माता का यह स्वरूप देवी पार्वती के विवाह के बाद से लेकर संतान कुमार कार्तिकेय की प्राप्ति के बीच का है। इस रूप में देवी संपूर्ण सृष्टि को धारण करने वाली और उनका पालन करने वाली हैं। संतान की इच्छा रखने वाले लोगों को देवी के इस स्वरूप की पूजा आराधना करनी चाहिए। सांसारिक लोगों यानी घर परिवार चलाने वालों के लिए इस देवी की पूजा बेहद कल्याणकारी है। मां का यह स्‍वरूप मंद-मंद मुस्‍कुराहट वाला है। कहा जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तो देवी भगवती के इसी स्‍वरूप ने मंद-मंद मुस्‍कुराते हुए सृष्टि की रचना की थी। इसीलिए ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा और आदिशक्ति हैं। देवी कूष्‍मांडा का निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में माना गया है। वहां निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल देवी के इसी स्‍वरूप में है। मां के शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान है। देवी कूष्‍मांडा के इस दिन का रंग हरा है। मां के सात हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्‍प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र और गदा है। वहीं आठवें हाथ में जपमाला है, जिसे सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली माना गया है। मां का वाहन सिंह है। देवी कूष्‍मांडा की आराधना करने से आराधकों के सभी रोग-शोकों का नाश हो जाता है। इसके अलावा मां की कृपा से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य समृद्धि आती है। जो लोग अक्सर बीमार रहते हैं उन्हें देवी कूष्मांडा की पूजा श्रद्धा भाव सहित करना चाहिए। देवी कूष्‍मांडा की कृपा और आशीर्वाद पाने के लिए ‘या देवी सर्वभू‍तेषु कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।’ श्‍लोक का यथाशक्ति जप करें। इससे मां प्रसन्‍न होती हैं और भक्‍त को सुख-समृद्धि और आरोग्‍यता का वर देती हैं। संस्कृत में कूष्मांड कद्दू और कुम्हरे को कहा जाता है जिससे पेठा तैयार किया जाता है। इस ब्रह्माण्ड को कुम्हरे से समान माना गया है जो बीच में खाली होता है और इसके चारों तरफ एक आवरण होता है। देवी ब्रह्माण्ड के मध्य में निवास करती हैं और सभी जीवों का संरक्षण करती है। इनको कुम्हरे की बलि सबसे प्रिय है। कुम्हरे से बना पेठा भी देवी का पसंद है इसलिए इन्हें प्रसाद स्वरूप पेठे का भोग लगाना चाहिए। नवरात्रि में रोज की भांति सबसे पहले कलश की पूजा कर माता कूष्मांडा को नमन करें। हो सके तो तो मां कूष्मांडा की पूजा में बैठने के लिए हरे या संतरी रंग के कपड़े पहनें। माँ कूष्मांडा को जल पुष्प अर्पित करें और उनसे कामना करें कि उनके आशीर्वाद से आपका और आपके स्वजनों का स्वास्थ्य अच्छा रहे। देवी को पूरे मन से फूल, धूप, गंध, भोग चढ़ाएँ। इनके भोग में हलवा सबसे शुभ माना गया है। इस देवी को लाल वस्त्र, लाल फूल, लाल चूड़ी अर्पित करना चाहिए। नवरात्रि पर मां दुर्गा के चौथे स्वरूप कूष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं। इनके हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल पुष्प, शंख, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। मां हाथ में कलश भी धारण करती हैं। जो सूरा और रक्त से भरा है। पौराणिक मान्यता है कि मां के इस स्वरूप की पूजा करने से भय से मुक्ति मिलती है।

  • कूष्मांडा माता के मंत्र:-

-ॐ जूं ह्री ऐं कुष्मांडा देव्यै नम:

– सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

– या देवि सर्वभूतेषू सृष्टि रूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

  • मां कूष्मांडा की आरती:-

कूष्मांडा माता की आरती

कुष्मांडा जय जग सुखदानी

मुझ पर दया करो महारानी

पिंगला ज्वालामुखी निराली

शाकम्बरी माँ भोली भाली

लाखो नाम निराले तेरे

भगत कई मतवाले तेरे

भीमा पर्वत पर है डेरा

स्वीकारो प्रणाम ये मेरा

संब की सुनती हो जगदम्बे

सुख पौचाती हो माँ अम्बे

तेरे दर्शन का मै प्यासा

पूर्ण कर दो मेरी आशा

माँ के मन मै ममता भारी

क्यों ना सुनेगी अर्ज हमारी

तेरे दर पर किया है डेरा

दूर करो माँ संकट मेरा

मेरे कारज पुरे कर दो

मेरे तुम भंडारे भर दो

तेरा दास तुझे ही ध्याये

‘भक्त’ तेरे दर शीश झुकाए

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