नवरात्रि 2019: देवी दुर्गा की तीसरी शक्ति है माँ “चंद्रघंटा”, पढ़ें देवी का मंत्र और कथा

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां चंद्रघंटा का मुख तेज आभा सा चमकता है। मां शेर पर सवारी करती हैं और उनकी दस भुजाएं हैं और जिसमें अस्त्र और शस्त्रों विराजित हैं। मां की घंटे के समान ध्वनि सुनकर राक्षस भी कांपते हैं। कुंवार मास की नवारात्रि इस साल 2019 में 29 सितंबर 2019 में शुरु हो रही है। मां के इस स्वरूप की पूजा करने से विजय का आर्शीवाद प्राप्त होता है। तो आइए जानते हैं तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें महत्व, पूजा विधि, माता चंद्रघंटा की कथा, मंत्र और आरती। 

  • मां चंद्रघंटा का स्वरूप

मां चंद्रघंटा का मुख तेज स्वर्ण आभा के समान है। मां के माथे पर घंटी के आकार का अर्ध चंद्रमा विराजमान है। जिसके कारण मां को चंद्रघंटा नाम से जाना जाता है। जिससे मां का स्वरूप और भी ज्यादा सुंदर लगता है। मां की दस भुजाएं हैं। जिनमें धनुष, त्रिशुल, गदा और खडग और कमंडल विराजमान है। मां शेर पर सवारी करती हैं और लाल वस्त्र धारण करती हैं। मां के घंटे के समान ध्वनि के कारण राक्षस भी कांपने लगते हैं। जो भी भक्त नवरात्र मे मां कि विधिवत पूजा करता है उसे अलौकिक ध्वनियां सुनाई देती हैं।

  • मां चंद्रघंटा की पूजा का महत्व

मां चंद्रघंटा की पूजा करने से सहास बढ़ता है और भय से मुक्ति मिलती है। मां की दस भुजाएं हैं जो अस्त्रों और शस्त्रों से सुशोभित है। मां की सवारी सिंह है और वह हमेशा युद्ध के लिए तैयार रहती है। तंत्र साधना में मां का यह स्वरूप मणिपुर चक्र को जाग्रत करता है। चंद्रघंटा माता हमेशा दुष्टों का संहार करने के लिए तैयार रहती हैं। मां चंद्रघंटा की पूजा करने से मंगल ग्रह के दोषों से मुक्ति मिलती है। इसलिए नवरात्र में तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा अवश्य करनी चाहिए। मां कि विधिवत पूजा करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

  • मां चंद्रघंटा की पूजा विधि

सबसे पहले साधक को सूर्योदय से पूर्व स्नान करके साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद एक चौकी को गंगा जल से साफ करना चाहिए। इसके बाद कलश और मां की प्रतिमा स्थापित करें। मां चंद्रघंटा की पूजा के लिए वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधितद्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान आदि सभी चीजें मां को अर्पित करें। इसके बाद पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। मंत्र का जाप करते हुए पुष्प अर्पित करें और मां कि विधिवत पूजा करें। दुर्गासप्तशती के मंत्रों को जाप करें और मां की कथा सुने और उनकी धूप व दीप से आरती उतारें। इस दिन मां चंद्र घंटा को दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं और साथ ही सेब और गुड़ का भी भोग लगाएं।

  • मां चंद्रघंटा की कथा

एक बार महिषासुर नाम के एक राक्षस ने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया उसने देवराज इंद्र को युद्ध में हराकर स्वर्गलोक पर विजय प्राप्त कर ली और स्वर्गलोक पर राज करने लगा। युद्ध में हारने के बाद सभी देवता इस समस्या के निदान के लिए त्रिदेवों के पास गए। देवताओं ने भगवन विष्णु, महादेव और ब्रह्मा जी को बताया की महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्‍य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और उन्हे बंदी बनाकर स्वर्ग लोक पर कब्जा कर लिया है। देवताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्याचार के कारण देवताओं को धरती पर निवास करना पड़ रहा है।देवताओं की बात सुनकर त्रिदेवों को अत्याधिक क्रोध आ गया। और उनके मुख से ऊर्जा उत्पन्न होने लगी। इसके बाद यह ऊर्जा दसों दिशाओं में जाकर फैल गई। उसी समय वहां पर एक देवी ने अवतार लिया। भगवान शिव ने देवी को त्रिशुल विष्णु जी ने चक्र दिया। इसी तरह अन्य देवताओं ने भी मां को अस्त्र शस्त्र प्रदान किए। इंद्र ने मां को अपना वज्र और घंटा प्रदान किया। भगवान सूर्य ने मां को तेज और तलवार दिए। इसके बाद मां को सवारी के लिए शेर भी दिय गया। मां अपने अस्त्र शस्त्र लेकर महिषासुर से युद्ध करने के लिए निकल पड़ीं। मां का रूप इतना विशालकाय था कि उनके इस स्वरूप को देखकर महिषासुर अत्यंत ही डर गया। महिषासुर ने अपने असुरों को मां पर आक्रमण करने के लिए कहा। सभी राक्षस से युद्ध करने के लिए मैदान में उतर गए। मां ने सभी राक्षसों का संहार कर दिया। मां ने महिषासुर के सभी बड़े राक्षसों को मार दिया और अंत में महिषासुर का भी अंत कर दिया। इस तरह मां ने देवताओं की रक्षा की और उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति कराई।

  • मां चंद्रघंटा के मंत्र

1.पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

2.वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।

सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥

मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।

खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।

मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥

प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।

कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

3.ऐं श्रीं शक्तयै नम:

4.या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नसस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

  • मां चंद्रघंटा की आरती

जय माँ चन्द्रघंटा सुख धाम।

पूर्ण कीजो मेरे काम॥

चन्द्र समाज तू शीतल दाती।

चन्द्र तेज किरणों में समाती॥

क्रोध को शांत बनाने वाली।

मीठे बोल सिखाने वाली॥

मन की मालक मन भाती हो।

चंद्रघंटा तुम वर दाती हो॥

सुन्दर भाव को लाने वाली।

हर संकट में बचाने वाली॥

हर बुधवार को तुझे ध्याये।

श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥

मूर्ति चन्द्र आकार बनाए।

शीश झुका कहे मन की बाता॥

पूर्ण आस करो जगत दाता।

कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥

कर्नाटिका में मान तुम्हारा।

नाम तेरा रटू महारानी॥

भक्त की रक्षा करो भवानी।

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