न्यूयॉर्क में बना रूसी खुफिया एजेंसी का म्यूजियम, देखने मिलेंगे ख़ुफ़िया बटन, बेल्ट कैमरा जैसे जासूसी उपकरण

अब न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी का एक म्यूजियम बनाया गया है।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ (अब रूस) में आगे निकलने की होड़ शुरू हुई। इस दौरान दोनों देशों में कोई जंग तो नहीं हुई लेकिन खुद को ज्यादा ताकतवर साबित करने वाले काम हुए। इसे शीत युद्ध (कोल्ड वॉर) नाम दिया जाता है। एक-दूसरे की अहम सूचनाओं को हासिल करने के लिए दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों ने कई कारनामे रचे। अब न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी का एक म्यूजियम बनाया गया है। इसमें शीतयुद्ध के दौरान केजीबी द्वारा इस्तेमाल की गई कई चीजें रखी गई हैं।म्यूजियम में जाते ही आपको जंग के माहौल का अहसास होगा।

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दीवारों पर रूसी क्रांति के जनक रहे व्लादिमीर लेनिन की तस्वीरें लगी हुई हैं, बैकग्राउंड में मिलिट्री म्यूजिक बजता रहता है। यहां जासूसी में इस्तेमाल होने वाली कई जुटाई गई हैं।म्यूजियम के पीछे 55 साल के लिथुआनियन इतिहासकार जूलियस उरबैटिस की मेहनत है। उन्होंने करीब तीन दशकों तक दुनिया की यात्रा की और जासूसी की 3500 से ज्यादा चीजें जुटाईं।म्यूजियम में बटन, बेल्ट या अन्य एसेसरीज में लगाए जाने वाले कई कैमरे रखे गए हैं। साथ ही लिपस्टिक गन, माइक्रोफोन भी रखे गए हैं। ऐसे जूतों का प्रदर्शन किया गया है जिसमें बने खांचों में दस्तावेज छिपाकर ले जाए जा सकते थे। यहां पर कोल्ड वॉर दौर का फर्नीचर, टाइपराइटर्स, सिगरेट और चाय के कप भी रखे गए हैं।म्यूजियम आने वालों के लिए एक अन्य सुविधा भी रखी गई है। इसमें रूसी बोलने वाला गाइड भी मुहैया कराया जाएगा। इसके लिए सेंट पीटर्सबर्ग में तैनात रहे एक पूर्व जासूस सर्गेई कोलोसोव को नियुक्त किया है। जूलियस उरबैटिस और उनकी 29 साल की बेटी एग्ने म्यूजियम की को-क्यूरेटर हैं। म्यूजियम की मालिक एक अमेरिकन कंपनी है जो कई पुरानी-ऐतिहासिक चीजों को खरीदती है।

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इसी अमेरिकन कंपनी को लिथुआनिया के पिता-बेटी के शोध के बारे में पता चला। जूलियस और एग्ने ने कुछ साल पहले कॉनास (लिथुआनिया) में एक न्यूक्लियर बंकर को केजीबी म्यूजियम के रूप में बदला था। द्वितीय विश्व युद्ध में सोवियत सेनाओं द्वारा जीता गया लिथुआनिया अकेला देश था जिसे 1991 में आजादी मिली। जूलियस बताते हैं, “अमेरिकंस कई बार लिथुआनिया आते थे और मुझसे पूछते थे कि क्या मैं वहां पर कोई म्यूजियम बनाना चाहता हूं। उनकी ऐसे किसी व्यक्ति से मिलने की इच्छा नहीं होती थी जो सोवियत दौर को नहीं जानता।” हालांकि जूलियस म्यूजियम को गैर-राजनीतिक करार देते हैं। उनका कहना है कि यह इसलिए बनाया गया ताकि लोगों को केजीबी की तकनीकों के बारे में पता चल सके।

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