फेडरल फ्रंट का इतिहास: सरकार तो बनाते हैं, लेकिन एक साल से ज्यादा चला नहीं पाते

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : नई दिल्ली। कोलकाता के बिग्रेड मैदान में विपक्ष के 22 दलों की मेगा रैली हुई. इस रैली के जरिए देश को संदेश देने के कोशिश की गई कि देश में तीसरा विकल्प यानि यूनाइटेड फ्रंट तैयार हो गया है. अब क्या गारंटी है कि मोदी सरकार को हराने के लिए खुद को एकजुट करने में जुटा विपक्ष, अगर कामयाब हो भी जाता है तो प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए टूटकर बिखर नहीं जाएगा. वैसे इतिहास गवाह है कि जब भी सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ विपक्ष एकजुट हुआ है. तब-तब सत्ताधारी पार्टी को हारना पड़ा है, लेकिन इतिहास ये भी कहता है कि छोटे और क्षेत्रीय दलों की खिचड़ी सरकारें ज्यादा दिन टिक नहीं पाती हैं. इन सरकारों की मियाद ज्यादा से ज्यादा एक साल रही है. आंकड़े तो यही बता रहे हैं.

– 1989 के लोकसभा चुनाव में 143 सीटें जीतने वाले जनता दल ने बीजेपी और बाकी छोटी पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाई. वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने लेकिन 343 दिन ही रह पाए.

– जनता दल टूटा और समाजवादी जनता दल नाम से नई पार्टी बनी. इसके नेता चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने, लेकिन वो सिर्फ 223 दिन ही सरकार चला पाए और 1991 में दोबारा लोकसभा चुनाव करवाने पड़े.

– 1996 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी पहली बार 161 सीट जीती. अन्य पार्टियों के समर्थन से अटल बिहारी बाजपेयी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने. उनकी ये सरकार सिर्फ 13 दिन ही चल पाई.

– वाजपेयी सरकार गिरने के बाद जनता दल के नेतृत्व में यूनाइटेड फ्रंट की सरकार ने शपथ ली. इस सरकार में एचडी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने, लेकिन देवेगौड़ा 324 दिन तक ही प्रधानमंत्री के पद पर रह पाए.

– कांग्रेस ने देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस ले लिया, लेकिन चुनाव टालने के लिए कांग्रेस ने इंद्र कुमार गुजराल के नेतृत्व में इस गठबंधन को फिर से बाहर से समर्थन दे दिया, लेकिन यूनाइटेड फ्रंट की गुजराल सरकार 332 दिन ही चल पाई. करीब दो साल में 2 प्रधानमंत्री बदलकर ये सरकार गिर गई.

– 1998 में लोकसभा चुनाव में जनता ने एक बार फिर किसी पार्टी को बहुमत नहीं दिया. इस बार 182 सीट के साथ बीजेपी ने कई पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाई और वाजपेयी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने, लेकिन 13 महीने सरकार चलने के बाद वाजपेयी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया, जिसमें एआईएडीएमके के एक वोट की वजह से वाजपेयी की सरकार गिर गई. इसलिए देश को फिर चुनावों में जाना पड़ा.

यानी इतिहास के आइने में विपक्षी एकता के नाम पर यूनाइटेड फ्रंट बना जरूर, लेकिन यूनाइटेड फ्रंट की सरकार कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है और देश को वक्त से पहले चुनावों में धकेला गया है. अब एक बार फिर मोदी सरकार के खिलाफ फेडरल फ्रंट तैयार है. कोलकाता की रैली में ममता बनर्जी ने दावा भी किया कि हमारी गठबंधन की सरकार मोदी सरकार से अच्छा चलेगी, लेकिन इतिहास के लिहाज से ऐसा हो पाना मुश्किल दिखाई पड़ता है.

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