16 जनवरी: जय भवानी के उद्घोष संग आज ही हुआ था छत्रपति शंभूराजे महराज का राजतिलक

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : नई दिल्ली।वो महान योद्धा जो टुकड़ो टुकड़ो में कट जाए पर धर्म को न त्यागे , वो गौरवगाथा जो तमाम मुगल सेना पर अकेले भारी पड़ जाए, भगवा ध्वज को थामे हुए वो प्रखर आवाज जो अकेले ही खामोश कर दे उन तमाम क्रूर आक्रांताओं को जो सोचते थे कि उनके अत्याचार से कोई भी झुक सकता है.. अगर आप आज के समय वीडियो में किसी आतंकी की किसी बंधक द्वारा दरिंदगी देखते हैं या लाइव कैमरे के आगे उसके सर कलम होने की घटना देख कर विचलित होते हैं जो इतना याद रखा कीजिये कि वो सोच, वो दरिंदगी कोई नई बात नहीं है .. जो आज इराक या सीरिया में देखा जा रहा उस से कहीं क्रूर चेहरा हमारे पूर्वजो ने उसी सोच, उसी कट्टरता का देखा है. ज्ञात हो कि सेकुलरिज़्म की दुहाई देने वालों को कम से कम एक बार छत्रपति शंभूराजे का जीवन पढ़ना चाहिए..यद्द्पि नकली कलमकारों ने उनके जीवन को इतिहास के पन्नो से हटा कर उस नरपिशाच का जीवन जोड़ दिया जिसको हिंदुओं की लाश देख कर अजीब सुकून मिलता था.. आज ही के दिन हिंदवी साम्राज्य की परिकल्पना के साथ भगवा ध्वज थाम कर , जय भवानी के उद्घोष के बीच मे छत्रपति शिवाजी महाराज के सुपुत्र छत्रपति संभाजी महराज ने हिंदुओं की रक्षा व सुरक्षा की शपथ ली थी और उनका भव्य राजतिलक किया गया था महाराष्ट्र की पावन व वीरभूमि पर ..यद्द्पि उन्होंने अपने उस वचन को भी अक्षरशः निभाया जिसमें उन्होंने अंतिम सांस तक राज्य व धर्म की रक्षा का संकल्प लिया था.

शम्भाजी / शंभू राजे छत्रपति शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र और उत्तराधिकारी थे, जिसने 1680 से 1689 ई. तक राज्य किया।शम्भुजी ने नीलोपन्त को अपना पेशवा बनाया। उसने 1689 ई. तक शासन किया। संभाजी ने उन्होंने साहस एवं निडरता के साथ औरंगजेब की आठ लाख सेना का सामना किया तथा अधिकांश मुग़ल सरदारों को युद्ध में पराजित कर उन्हें भागने के लिए विवश कर दिया। 24 से 32 वर्ष की आयु तक शंभू राजा ने मुग़लों की पाश्विक शक्ति से लडाई की एवं एक बार भी यह योद्धा पराजित नहीं हुआ। इसलिए औरंगजेब दीर्घकाल तक महाराष्ट्र में युद्ध करता रहा। उसके दबाव से संपूर्ण उत्तर हिंदुस्तान मुक्त रहा। यदि उन्होंने औरंगजेब के साथ समझौता किया होता अथवा उसका आधिपत्य स्वीकार किया होता तो, वह दो-तीन वर्षों में ही पुन: उत्तर हिंदुस्तान में आ धमकता; परंतु संभाजी राजा के संघर्ष के कारण औरंगजेब को 27 वर्ष दक्षिण भारत में ही रुकना पडा। इससे उत्तर में बुंदेलखंड, पंजाब और राजस्थान में हिंदुओं की नई सत्ताएं स्थापित होकर हिंदू समाज को सुरक्षा मिली। ज्येष्ठ शुद्ध 12 शके 1579, गुरुवार दिनांक 14 मई 1657 को पुरंदरगढ पर स्वराज्य के दूसरे छत्रपति का जन्म हुआ। शंभू राजा के जन्म के दो वर्ष पश्चात् इनकी माता सई बाई की मृत्यु हो गई एवं राजा मातृसुख से वंचित हो गए। परंतु जिजाऊ ने इस अभाव की पूर्ति की। जिस जिजाऊ ने शिवाजी को तैयार किया, उसी जिजाऊ ने संभाजी राजा पर भी संस्कार किए। संभाजी शक्ति संपन्नता एवं रूप सौंदर्य की प्रत्यक्ष प्रतिमा ही थे।

14 वर्ष की आयु तक बुधभूषणम् (संस्कृत), नायिकाभेद, सातसतक, नखशिख (हिंदी) इत्यादि ग्रंथों की रचना करने वाले संभाजी विश्व के प्रथम बालसाहित्यकार थे। मराठी, हिंदी, फ़ारसी , संस्कृत, अंग्रेज़ी, कन्नड़ आदि भाषाओं पर उनका प्रभुत्व था। जिस तेजी से उन्होंने लेखनी चलाई, उसी तेजी से उन्होंने तलवार भी चलाई। संभाजी महाराज ने ‘शुद्धीकरणके लिए’ अपने राज्य में स्वतंत्र विभाग की स्थापना की थी। छत्रपति संभाजी महाराज एवं कवि कलश ने बलपूर्वक धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बनाए गए हरसुल के ब्राह्मण गंगाधर कुलकर्णी को शुद्ध कर पुनः हिंदू धर्म में परिवर्तित करने का साहस दिखाया। संगमेश्वर से बहादुरगढ की दूरी लगभग 250 मील की है; परंतु मुक़र्रब ख़ाँ ने मराठों के भय से केवल 13 दिनों में यह दूरी पार की एवं 15 फ़रवरी 1689 को शम्भुजी तथा कवि कलश को लेकर वह बहादुरगढ में प्रवेश किया। पकड़े गए संभाजी कैसे दिखाई देते हैं, यह देखने के लिए मुग़ल सेना उत्सुक हो गई थी। औरंगजेब की छावनी अर्थात बाज़ार बुणगों का विशाल नगर ही था। छावनी का घेरा 30 मील का था, जिसमें 60 सहस्र घोड़े, 4 लाख पैदल, 50 सहस्र ऊंट, 3 सहस्र हाथी, 250 बाज़ार पेठ तथा जानवर कुल मिलाकर 7 लाख अर्थात बहुत बडी सेना थी। इसके पश्चात् भी आयु के 24वें से 32वें वर्ष तक शंभुराजा ने मुग़लों की पाश्विक शक्ति से लड़ाई की तथा यह योद्धा एक बार भी पराजित न हुआ।

आज ही के दिन अर्थात 16 जनवरी को इस महान वीर बलिदानी का राज्यभिशेषक रायगढ़ के किले में हुआ था इसलिए ये दिन हिन्दुओं के लिए किसी पावन पर्व से कम नही है. 1681- महाराष्ट्र के रायगढ़ किले में क्षत्रपति शिवाजी के पुत्र संभाजी का भव्य राज्याभिषेक हुआ जिसे याद दिलाना NLN परिवार का पावन कर्तव्य है जिसे तथाकथित नकली कलमकार या झोलाछाप इतिहासकार कभी सामने नहीं ला सकते क्योकि शिवाजी और शम्भाजी ऐसे वीर हैं जिन्होंने हिन्दवी साम्राज्य के लिए हिन्दुओं को जगाया है. आज इस पावन दिवस की संसार के सभी स्वाभिमानी जनता को बारम्बार शुभकामनाएं!

 

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