9 जनवरी: 1857 की जंग-ऐ-आज़ादी के गुमनाम शहीद “राजा नाहर सिंह”

1857 के इस क्रांतिवीर ने अंतिम इच्छा में “अंग्रेजों का नाश” मांगा था. गिरफ्तारी में गद्दारी थी इलाहीबख्स की

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : नई दिल्ली।आजादी के गौरवशाली इतिहास के असल पन्ने वो नहीं जो हमें पढ़ाये या कहा जाय तो रटाये जा रहे हैं.. स्वतंत्रता के वो पन्ने भी हैं जिन्हें हम जानते भी नही है .. बहुत कम लोगो को पता होगा राजा नाहर सिंह जी के इतिहास के बारे में जिनका आज बलिदान दिवस है .. 1857 की क्रांति का ये महान योद्धा आज तक अपने शौर्य के चलते अजर और अमर है .. आगे भी रहेंगे क्योंकि इनके परिजनों को इनके बलिदान का ढोल पीट कर कुछ लोगो की तरह आज़ादी की ठेकेदारी नही लेनी थी और साथ ही किसी भी प्रकार का लोभ या लालच भी नही था.. ये तो बस स्वतंत्रता के दीवाने थे जिन्हें परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ी भारत माँ को मुक्त करवाना था.. इन्होंने इस मार्ग पर अपना सर्वोच्च बलिदान दिया और आखिरकार इन्ही के प्रयास अंत मे रंग लाये.

महान क्रांतिकारी शहीद महाराजा नाहर सिंह तेवतिया. 9 जनवरी बलिदान दिवस के अवसर पर श्रद्धांजलि. फरीदाबाद-हरियाणा एक बहुत ही शक्तिशाली रियासत थी जिसका नाम बल्लभगढ़ था, इसके स्थापक हिन्दू वीर महाराजा बलराम सिंह जी थे।वल्लभगढ़ और भरतपुर रियासतों ने मिलकर जिहादियों से धर्म की रक्षा की थी. महाराजा बलराम सिंह की 7 वीं पीढ़ी में 6 अप्रैल 1821 को इस महान प्रतापी राजा नाहर सिंह ने जन्म लिया था।उस समय देश पर अंग्रेजो का अवैध शासन था. नाहर सिंह के बचपन का नाम नरसिंह था इनके ऊपर शिकार करते वक्त एक शेर ने हमला कर दिया था।तब नर सिंह और इनके अंगरक्षक ने शेर से टक्कर ली पर अंगरक्षक मृत्यु हो गयी फिर नरसिंह ने शेर को मार गिराया। उस समय ये मात्र 16 साल के ही थे। तब इनका नाम नर सिंह से नाहर सिंह हुआ।

उसके बाद उनका विवाह कपूरथला रियासत के राजा की पुत्री से कर दिया गया। 20 जनवरी 1839 को छोटी सी उम्र में उनका राजतिलक हुआ. राजा बनते ही उन्होंने सेना को मजबूत करना शुरू कर दिया। बल्लभगढ़ रियासत का उस समय नाम बलरामगढ़ था जो इसके संस्थापक महाराजा बलराम सिंह के नाम पर पड़ा था। इस रियासत की ओर आँख उठाने की अंग्रेजों हिम्मत भी नही पड़ती थी। महाराजा नाहर सिंह के नाम से अंग्रेज थर थर कांपते थे।

उन्होंने अंग्रेजो के अपनी रियासत में आने पर भी प्रतिबंध का फरमान जारी कर दिया था जो उस समय बड़े बड़े राजाओं के भी बस की बात नही थी। इसी बीच 1857 की क्रांति की योजना शुरू हुई उन्होंने गुड़गांव रेवाड़ी ग्वालियर फरुखनगर के राजाओं को एक ध्वज तले लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 18 मार्च 1857 को मथुरा में राजाओं की एक गुप्त मीटिंग हुई जिसमें नाहर सिंह को शिरमौर बनाया गया और इस मीटिंग के आयोजक व अध्यक्ष वही थे। इस सभा में तात्या टोपे भी शामिल थे. क्रांति की तारीख 31 मई रखी गई थी ताकि सब तक खबर पहुंचाकर पूरे देश में एक साथ क्रांति की जाये। मगर क्रांति पहले ही शुरू हो गई। जिससे अचानक से सब गड़बड़ा गया। मंगल पांडे बलिदान हो गए, और उसके बाद उस बटालियन के ज्यादातर सैनिक नाहर सिंह की सेना में शामिल हो गए।

क्रांति शुरू होते ही नाहर सिंह ने अंग्रेजो के काफिले रोकने शुरू कर दिए, और कई बार अंग्रेजो को मार कर भगाया।इस तरह वीर क्रांतिकारियों ने दिल्ली को अंग्रेजो के कब्जे से छुड़ा लिया. इसी के चलते दिल्ली 132 दिन तक आजाद रही। महाराजा ने आगरा से आती हुई अंग्रेज टुकड़ियों को भी काट दिया। जहाँ से अंग्रेज उनके सामने पहुंचे वही अंग्रेजी सेना का लहू नाहर की तलवार से लगा और विजय हुई। नाहर सिंह ने दिल्ली की सीमा की सुरक्षा की और अंग्रेजो को वहां से नही घुसने दिया. इसलिए अंग्रेज उन्हें आयरन गेट ऑफ डेल्ही कहने लगे.

अंग्रेजो ने फिर कुछ गद्दारो के साथ मिलकर योजना बनाई और दूसरी तरफ से जाकर बहादुर शाह जफर ने आत्मसमर्पण कर दिया.. बहादुर शाह के खास आदमी इलाहीबख्श जो गद्दार था को नाहर सिंह के पास भेजा गया. नाहर सिंह इन सब से अनजान थे. उस गद्दार ने महाराज को कहा कि आपको बहादुर शाह जफर ने बुलाया है अंग्रेजो से संधि की जायेगी. जब महाराज वहां पहुंचे तो नजारा कुछ और ही था।मौके का फायदा उठाकर धोखे से उन्हें 6 दिसम्बर 1857 को अंग्रेजो द्वारा बंदी बना लिया गया। उन्हे अंग्रेजो ने कहा कि सत्ता वापिस कर दी जायेगी अगर अंग्रेजों की दासता स्वीकार करो तो नाहर सिंह ने तेवर दिखाकर जवाब दिया कि मैं वो राजा नही जो देश के दुश्मनों के आगे झुक जाऊं, और जो देश से गद्दारी करे वो इलाहीबख्स मैं नहीं।

फिर चांदनी चौक पर उन्हें फांसी देने का प्रबंध किया गया। दिल्ली की जनता वहां खचाखच भर गई और भारत माता की जय और महाराजा नाहर सिंह की जय के नारों से दिल्ली गूंज उठी। अंग्रेज घबरा गए उन्होंने फांसी के फंदे पर भी राजा के सामने वही बात दोहराई, पर उन्होंने साफ कहा इस देश का दुश्मन मेरा दुश्मन और मैं कभी दुश्मनों के आगे झुकता नही राज ही चाहिए होता तो मैं विद्रोह करता ही नहीं. दिल्ली  की जनता को आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि देशवासियों एक चिंगारी पैदा करके जा रहा हूँ इससे आजादी की मशाल जलाए रखना।

एक नाहर सिंह मरेगा लाखो पैदा होंगे और इस अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकेगे। माँ भारती के हाथों में भारत का झंडा शान से लहराना चाहिए। और फिर भारत माँ की जय का नारा लगाकर उन्होंने हंसते हुए ख़ुशी से फांसी का फंदा चूम लिया। इस तरह एक महान क्रन्तिकारी महाराजा नाहर सिंह अपनी वीरता और देशभक्ति का किस्सा हमारे बीच छोड़ गए। उनके नाम पर हर साल मेला भी लगता है।

आज आज़ादी के उस महान शक्तिपुंज को उनके बलिदान दिवस पर बारंबार नमन और वंदन करते हुए उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प NLN परिवार लेता है ..उनके नाम को स्वर्ण के अक्षरों से लिखवाने तक ये प्रयास जारी रहेगा जिस से आगे आने वाली पीढियां इस देश व इस समाज के लिए राजा नाहर सिंह बन कर त्याग करें और और राष्ट्र व धर्म की रक्षा करें ..राजा नाहर सिंह जी अमर रहें। 

You might also like More from author

Leave A Reply

Your email address will not be published.

Facebook Auto Publish Powered By : XYZScripts.com