इस मंदिर में दाड़ी और मूंछ के साथ विराजमान हैं हनुमानजी, करते हैं मनोकामनाएं पूरी

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : नई दिल्ली।बालाजी भगवान हनुमान का ही एक रूप हैं। हनुमानजी और बालाजी के कई मंदिर देश और दुनिया में हैं। फिर भी जिन मंदिरों में बालाजी के दर्शन के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं, उनमें सालासर बालाजी का नाम प्रमुख है। सालासर बालाजी राजस्थान के चुरू जिले में स्थित हैं। सालासर जगह का नाम है। बालाजी का मंदिर सालासर कस्बे के ठीक मध्य में स्थित में है। लेकिन यहां दर्शन करने आनेवाले भक्तों के लिए उचित व्यस्था है।

भगवान बालाजी की मूर्ति प्रकट होने को लेकर एक कथा है। सालासर में रहनेवाले मोहन दासजी महाराज भगवान बालाजी के भक्त थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर एक बार बालाजी ने उन्हें सपने में दर्शन दिए और असोटा गांव में मूर्ति रूप में प्रकट होने की बात बताई। उधर असोटा गांव में रहनेवाले जाट गिन्थाला जब अपने खेत में हल जोत रहे थे तो उन्हें हल की सित से कुछ टकराने का अहसास हुआ और उन्होंने एक गूंजती हुई-सी आवाज सुनी।

हल को वहीं रोककर उन्होंने जमीन को खोदना शुरू किया तो उस जगह से दो मूर्तियां निकलीं। जाट उन मूर्तियों को देख ही रहे थे कि उनकी पत्नी खाना लेकर खेत पर पहुंच गईं और उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से उन मूर्तियों की मिट्टी हटाई तो समझ में आया कि ये मूर्तियां तो बालाजी भगवान की हैं। उस समय वह अपने पति के खाने के लिए बाटी और चूरमा लेकर आई थीं। बालाजी के प्रकट होने पर दोनों पति-पत्नी ने उन्हें श्रद्धा से प्रणाम किया और बाटी-चूरमें का भोग लगाया। बस तभी से बालाजी को बाटी और चूरमे का भोग लगाया जाता है। इस दिन संवत् 1811 के श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी।

खेत में मूर्ति निकलने की बात तुरंत पूरे गांव में फैल गई। यह खबर असोटा गांव के ठाकुर को भी मिली और उसी रात भगवान बालाजी महाराज ने ठाकुर के सपने में दर्शन देकर कहा कि मेरी मूर्ति को बैलगाड़ी में रखकर सालासर भेज दो और सालासर पहुंचने पर गाड़ी कोई न चलाए। जहां गाड़ी रुक जाए, वहीं एक प्रतिमा को स्थापित कर देना। दूसरी तरफ सालासर के मोहनदास जी ने भी ठाकुर को संदेशा भेजकर मूर्ति के बारे में पूछा। ठाकुर इस बात से आश्चर्य में पड़ गए कि आखिर सालासर में रहते हुए मोहनदास जी को बालाजी की मूर्ति के बारे में तुरंत कैसे पता चल गया।

सालासर में मूर्ति स्थापना को ईश्वर की इच्छा मानकर मूर्ति को आदेशानुसार बैलगाड़ी में रखकर सालासर भेज दिया गया। जहां वह बैलगाड़ी रूकी, आज वहीं पर सालासर बालाजी का मंदिर है। शायद यह बालाजी का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें भगवान बालाजी के दाड़ी और मूछ हैं। मोहनदास जी को भगवान ने जब सपने में दर्शन दिए थे, तब वह दाड़ी और मूछ के साथ इसी रूप में थे।

बालाजी की जो दो मूर्तियां निकली थीं उनमें से एक को सालासर में स्थापित कर दिया गया। वहीं, दूसरी मूर्ति को भरतगढ़ के पाबोलाम में स्थापित किया गया। यह स्थान सालासर से करीब 25 किलोमीटर दूर है। बालाजी के सालासर पहुंचने पर उनकी स्थापना और पूजा के लिए मोहनदास जी ने पवित्र अग्नि जलाई। इसे धूनी कहते हैं और यह धूनी आज भी जल रही है। कहते हैं करीब 300 साल से लगातार जल रही इस धूनी की राख बहुत से दुखों को दूर करती है। यही कारण है कि बालाजी के दर्शन करने आनेवाले भक्त इस धूनी की राख को अपने साथ प्रसाद के तौर पर ले जाते हैं।

सालासर बालाजी से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्मणगढ़ की ओर स्थित है माता अंजनी का मंदिर। इस मंदिर और मूर्ति के बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि माता अंजनि भगवान बजरंगबली के बुलावे पर सालासर आईं हैं। इस बारे में कथा है कि बजरंगबली ने माता से प्रार्थना की कि वह अपने भक्तों की गृहस्थ जीवन से संबंधित समस्याओं को दूर करने करने के लिए उनके साथ विराजित रहें। ताकि भक्तों की हर समस्या का निराकरण किया जा सके। तब बजरंगबली की विनती और अपने भक्त पन्नालाल की तपस्या से प्रसन्न होकर मां उनकी तपस्थली पर प्रकट हुईं।

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