‘कतर ने ओपेक से अलग होने का लिया निर्णय, एशिया पर क्या पड़ेगा इसका असर?

रान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजळ्एला- इन पांच देशों ने मिलकर वर्ष 1960 में ओपेक की स्थापना की थी।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ): विश्व के तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक यानी ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज में एक बार फिर टूट की खबर आ रही है। नवंबर 2016 में इंडोनेशिया द्वारा इसकी सदस्यता छोड़े जाने के बाद हाल ही में कतर ने भी इससे अलग होने का ऐलान किया है। पिछले दिनों दोहा में कतर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने कहा, ‘कतर ने यह तय किया है कि जनवरी 2019 से वह ओपेक का हिस्सा नहीं रहेगा। इस फैसले के बारे में ओपेक को अवगत करा दिया गया है।’ अब दुनिया भर में इस बात को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है कि कतर के इस निर्णय का अंतरराष्ट्रीय तेल व गैस के बाजार पर क्या और कैसा प्रभाव पड़ेगा। ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजळ्एला- इन पांच देशों ने मिलकर वर्ष 1960 में ओपेक की स्थापना की थी। फिर वर्ष 1961 से लेकर वर्ष 2018 के बीच कतर, इंडोनेशिया, लीबिया, यूएई, अल्जीरिया, नाईजीरिया, इक्वाडोर, अंगोला, इक्वेटोरियल गिनी, गबोन और कांगो जैसे देश इस संगठन में शामिल होते गए। हालांकि वर्ष 2016 में इंडोनेशिया ने अपनी सदस्यता इसलिए वापस ले ली, क्योंकि उसकी स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि उसे खुद तेल आयात करना पड़ रहा था। इससे पूर्व इक्वाडोर गिनी 1992 में ओपेक से अलग हुआ था। आर्थिक और राजनीतिक संकट के कारण उसकी सदस्यता वर्ष 2007 तक निलंबित रही। इसी तरह गबोन भी 1995 में ओपेक से अलग हुआ था, लेकिन 2016 में उसने फिर संगठन में वापसी कर ली। ओपेक की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक वर्तमान समय में इसके सदस्यों की संख्या कतर सहित 15 है। ओपेक की स्थापना का उद्देश्य इसके सदस्य देशों के बीच पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से संबंधित नीतियों को लेकर समन्वय स्थापित करना और उपभोक्ता देशों को नियमित रूप से निर्यात सुनिश्चित करना था। ओपेक द्वारा सदस्यों की आम सहमति से तेल निर्यात के लिए मूल्य तय किया जाता है जिससे न केवल सदस्य देशों को बिना किसी हितों के टकराव के समुचित लाभ भी हो जाता है, बल्कि उपभोक्ता देशों पर अधिक भार भी नहीं पड़ता। इसके अलावा तेल उत्पादन की मात्रा का निर्धारण भी ओपेक द्वारा किया जाता है।

वर्ष 2017 के आंकड़े के मुताबिक ओपेक देशों के पास दुनिया के कुल तेल भंडार का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मौजूद है जिसमें कतर की हिस्सेदारी 2.1 प्रतिशत है। वेनेजळ्एला और सऊदी अरब क्रमश: 25 और 22 प्रतिशत तेल भंडार के साथ ओपेक देशों में पहले व दूसरे स्थान पर मौजूद हैं। साथ ही सऊदी अरब चूंकि इस संगठन का संस्थापक देश भी है, इसलिए उसका ओपेक पर सर्वाधिक प्रभाव रहता है। उल्लेखनीय है कि गत वर्ष सऊदी अरब ने यमन, लीबिया, बहरीन, मालदीव आदि देशों के साथ मिलकर कतर के बहिष्कार का अभियान चलाया था। सऊदी अरब का आरोप था कि कतर ईरान के आतंकी तत्वों को बढ़ावा देकर अशांति पैदा करने की कोशिश कर रहा है। इसके बाद से ही इन दोनों देशों के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था। माना जा रहा है कि सऊदी अरब से अपने टकराव के कारण ही कतर ओपेक की सदस्यता छोड़ रहा है। हालांकि कतर की तरफ से इस तरह की बातों से इन्कार किया गया है। कतर का कहना है कि वह अपनी संभावनाएं तेल की बजाय गैस उत्पादन में देख रहा है और उसी पर ध्यान देना चाहता है, इसलिए उसने ओपेक की सदस्यता छोड़ने का निर्णय लिया है। अभी कतर का गैस उत्पादन 77 मिलियन टन है जिसे बढ़ाकर वह 110 मिलियन टन करना चाहता है। मौजूदा दौर में भी कतर दुनिया के गैस निर्यातक देशों में शीर्ष पर है, जबकि तेल के मामले में उसकी स्थिति ऐसी नहीं है। सऊदी अरब के प्रभुत्व वाले इस संगठन में रहते हुए वह अपनी इच्छानुसार तेल उत्पादन बढ़ा भी नहीं सकता है। जाहिर है ओपेक में सऊदी अरब का दबाव झेलते हुए बने रहना कतर के लिए कोई फायदे का सौदा नहीं है। ओपेक से अलग होने के बाद वह न केवल अपने गैस उत्पादन, बल्कि तेल उत्पादन में भी वृद्धि के लिए जोर लगा सकता है। दरअसल तेल के उत्पादन के लिहाज से देखें तो कतर एक छोटा सा देश है, लेकिन गैस के बाजार में वह एक बड़ा खिलाड़ी है। खासकर एलएनजी बाजार में कतर का अच्छा-खासा दबदबा है। एशिया के बाजार में फिलहाल जो ग्रोथ रेट है, उसमें हिस्सेदारी बढ़ाने के हिसाब से यह बात मायने रखती है। साद अल-काबी भी दोहा में यह बात कह चुके हैं कि तेल बाजार में उनके लिए बहुत संभावनाएं नहीं है। उनका कहना है कि उन्हें वास्तविक तथ्यों का अंदाजा हो चुका है, लेकिन यह भी सच है कि गैस बाजार में उनके लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। कहा जा रहा है कि कतर के ओपेक से अलग होने से डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ सकते हैं। देखा जाए तो कतर की ओर से रोजाना 6.10 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन होता है। वहीं सारे ओपेक देशों का कुल उत्पादन 3.33 करोड़ बैरल प्रतिदिन होता है। यानी महज दो फीसद कच्चा तेल ही कतर की ओर से आ रहा है। पूर्व में उल्लेख किया जा चळ्का है कि ओपेक इस बात को सुनिश्चित करता है कि किस दिन कितनी मात्रा में कच्चे तेल का उत्पादन किया जाए। वर्ष 2014 में कच्चे तेल का बहुत अधिक उत्पादन होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें काफी गिरी थीं। अब अगर ओपेक को कतर की तरफ से कच्चा तेल नहीं भी मिलेगा, तो भी वह बाकी देशों से उत्पादन बढ़ाकर कीमत को नियंत्रण में रख सकता है। जाहिर है कतर के ओपेक से बाहर जाने से न तो कच्चे तेल की कीमत बढ़ेगी और न ही उससे बनने वाले डीजल-पेट्रोल की। भारत अभी प्राकृतिक गैस के मामले में बहुत हद तक कतर पर निर्भर है, लेकिन कच्चे तेल के लिए उसकी निर्भरता प्रमुख रूप से इराक, सऊदी अरब और ईरान पर टिकी हळ्ई है। इसी वर्ष जून में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान से भारत के तेल आयात में गत वर्ष के मुकाबले 52 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। ईरान की तुलना में इराक और सऊदी अरब से आयात में कम वृद्धि हुई है। हालांकि कच्चे तेल के लिए भारत के प्रमुख निर्यातक देश सऊदी अरब और इराक ही हैं, लेकिन इन ताजा आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि भारत कच्चे तेल का अपना आयात ईरान की तरफ मोड़ने की कोशिश में लगा है, लेकिन इसमें पेंच अमेरिका की तरफ से फंस सकता है। अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के लिए उसके तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया है जो कि बीते चार नवंबर से लागू हो चुका है। वैसे अमेरिका के इस प्रतिबंध के आगे भारत और चीन जैसे कुछ देशों ने झुकने से इन्कार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उसे इन देशों को ईरान से आयात की मंजूरी देनी पड़ी। लेकिन अमेरिका इस मंजूरी को बहुत अधिक समय तक जारी रखेगा और ईरान से आयात में कोई बाधा नहीं खड़ी करेगा, फिलहाल ऐसा कहना कठिन है। ऐसे में भारत के पास अब कच्चे तेल के लिए कतर भी एक स्वतंत्र विकल्प के रूप में मौजूद रहेगा। देखा जाए तो अभी तक कतर भारत के लिए ओपेक के एक सहयोगी देश की तरह ही रहा है। अत: कतर के ओपेक से अलग होने का एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि यदि भविष्य में ओपेक तेल उत्पादन में कटौती का फैसला लेता है, तो भारत कतर से तेल खरीद का फैसला ले सकता है। स्वतंत्र खरीद की स्थिति में ओपेक देशों की अपेक्षा कतर से भारत को कम मूल्य पर तेल मिलने की भी संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। वैसे इस मामले में एक पहलू यह भी है कि चूंकि भारत के संबंध कतर और सऊदी अरब दोनों से ही अच्छे हैं, ऐसे में तेल तो नहीं, लेकिन किसी भी विवाद की स्थिति में प्राकृतिक गैस पर तलवार लटक सकती है। आज इन दोनों देशों के बीच तनाव साफ झलक रहा है। ऐसे में भारत के सामने यह चुनौती होगी कि इन दोनों ही देशों या फिर ओपेक समूह और कतर दोनों ही से अपने संबंध संतुलित ढंग से रखे जिससे तेल और गैस के आयात में उसे आर्थिक नुकसान न उठाना पड़े। कुल मिलाकर फिलहाल यह कहा ही जा सकता है कि ओपेक से कतर का अलग होना दुनिया के तेल बाजार में निकट भविष्य में कोई खास असर नहीं डालेगा। रही प्राकृतिक गैस की बात तो इस मामले में कतर पहले से सबसे बड़ा खिलाड़ी है, अब वह अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा। उम्मीद है कि किसी तरह की आशंका के विपरीत गैस के बाजार में सकारात्मक बदलाव ही होंगे।

कतर के निर्यात का तकरीबन 80 प्रतिशत हिस्सा एशिया में आता है। अपने कुल गैस उत्पादन का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा कतर भारत को निर्यात करता है। भारत की लगभग 65 प्रतिशत गैस जरूरतें कतर से ही पूरी होती हैं। यानी अगर ओपेक और कतर के बीच में कोई विवाद की स्थिति हुई और भारत को दोनों में से किसी एक को चुनना पड़ा तो इससे मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। भारत के अलावा बांग्लादेश पर भी इसका प्रभाव पड़ने की संभावना है। चूंकि अभी गत वर्ष जून में बांग्लादेश ने कतर की एक प्रमुख गैस कंपनी ‘रासगैस’ से करार किया है। इस करार के तहत बांग्लादेश को कतर से 2.5 मिलियन टन प्रतिवर्ष के हिसाब से गैस की आपूर्ति अगले डेढ़ दशक तक होनी है। जानकारों की मानें तो बांग्लादेश ने गैस प्राप्त करने के लिए आधारभूत ढांचे के विकास की दिशा में भी काफी काम कर लिया है। इसी साल से आपूर्ति शुरू होनी थी, लेकिन कई प्रकार के तकनीकी कारणों से अभी इसकी शुरुआत नहीं हुई है। अब ओपेक से अलग होने के बाद कतर का इस करार को लेकर क्या रुख रहता है, इस पर बांग्लादेश की नजर रहेगी। संभव है कि बांग्लादेश के लिए इसका कुछ सकारात्मक प्रभाव ही निकलकर सामने आए। इसके अलावा दक्षिण कोरिया, जापान आदि एशियाई देशों में भी कतर का भारी निर्यात है, लिहाजा इसमें कोई संदेह नहीं कि उसके ओपेक से अलग होने का एशिया पर प्रभाव पड़ेगा। हालांकि वह प्रभाव कैसा होगा, यह काफी हद तक कतर और एशियाई देशों के रुख पर निर्भर करेगा। कतर ने ओपेक की सदस्यता त्यागने की घोषणा की है जो बीते 57 वर्षों से इस संगठन का सदस्य था। हालांकि ओपेक देशों द्वारा तेल उत्पादन में कतर की हिस्सेदारी महज दो फीसद है, लेकिन इसके इस संगठन से बाहर निकलने को मध्य पूर्व देशों की राजनीति में एक बड़ा कदम माना जा रहा है जिसके अनेक दूरगामी नतीजे सामने आ सकते हैं। माना जा रहा है कि बीते कुछ समय से सऊदी अरब से टकराव के कारण भी कतर ओपेक की सदस्यता छोड़ रहा है।

 

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