कौलान्तक पीठ द्वारा राजस्थान के बांसवाड़ा में संपन्न हुआ मातंगी महाविद्या का शिविर।



(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : भगवान शिव द्वारा स्थापित सृष्टि की प्राचीनतम पीठ कौलान्तक पीठ के द्वारा महाविद्या मातंगी की साधना का शिविर, राजस्थान के बांसवाड़ा में 26 और 27 अक्टूबर 2018 को संपन्न हुआ। यह शिविर स्वयं कौलान्तक पीठ के पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्रनाथ (ईशपुत्र) की देखरेख में संपन्न किया गया।
मातंगी तांत्रिक माहाविद्याओं के क्रम में नौवीं महाविद्या हैं। कौलान्तक पीठाधीश्वर ईशपुत्र के मुख से गुरु-शिष्य परम्परानुसार यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए भारत के विभिन्न कोनों के साथ विदेशों से भी अनेक जिज्ञासु-साधक राजस्थान के इस छोटे से शहर बांसवाड़ा की पवित्र धरती में पहुंचे। निश्चित ही कौलान्तक पीठ जो कि स्वयं आदिनाथ भगवान शिव द्वारा साधकों को ज्ञान देने के लिए स्थापित की गई पीठ है, उसमें अनेकानेक रहस्य, रहस्य ही रह जाते हैं, लेकिन ईशपुत्र करुणावश साधकों के लिए अनेकों रहस्यों को हर महीने होने वाले शिविरों में खोल देते हैं।

इन शिविरों में ईशपुत्र के मुख से वह ज्ञान सुनने का मौक़ा साधकों को मिलता है जो अभी तक इस धरती पर कहीं और नहीं मिलता, क्योंकि यह ज्ञान अभी तक हिमालय के सिद्धों के पास ही रहस्य बनकर छुपा हुआ था। 

महाविद्याओं का ज्ञान मनुष्य ही नहीं देवताओं के लिए भी दुर्लभ होता है। ऐसे में हिमालय के सिद्धों की परम्परा से आए महासिद्ध ईशपुत्र जब नौवीं माहाविद्या मातंगी का ज्ञान देने के लिए तैयार हुए तो विश्व भर के साधकों ने इसे गुरुमंडल द्वारा दिए गए अत्यंत दुर्लभ मौकों में से एक माना।
मातंगी महाविद्या के विषय में भी ईशपुत्र ने अनेक रहस्यों का रहस्योद्घाटन गंभीर साधकों के समक्ष किया।

मातंगी महाविद्या के विषय में बताते हुए ईशपुत्र ने कहा कि, मातंगी का शाब्दिक अर्थ मात-अंगी, से है अर्थात जिसके हर अंग में मातृत्व का वास हो। मातंगी महाविद्या ऐसी शक्ति हैं जिनका प्रत्येक अंग मातृत्व से ओतप्रोत है। सामान्यतः स्त्री का एक अंग गर्भ ही है, जिसमें मातृत्व का वास माना जाता है। लेकिन मातंगी ऐसी शक्ति हैं, जिनका प्रत्येक अंग अपने आप में गर्भ स्वरुप होता है।

मातृत्व का रहस्य बताते हुए ईशपुत्र ने कहा कि मातृत्व वास्तव में सृजनात्मक शक्ति नहीं, संवर्धन करने वाली शक्ति होती है। ठीक इसी तरह मातंगी माता के हरेक अंग में ब्रह्माण्ड के हर एक प्राणियों का संवर्धन करने की क्षमता समाहित होती है। मस्तिष्क के हर तंतुओं को अति विकसित करने की क्षमता मातंगी महाविद्या की साधना में निहित है। वस्तुतः मातंगी माहविद्या साधना मानव को महामानव बनाने की अद्भुत और अद्वितीय साधना है।
गीत व अन्य कलाओं की अधिष्ठात्री देवी भी मातंगी को माना गया है।
मातंगी माहाविद्या से जुड़ी मतंग ऋषि की प्राचीन कहानी को सुनाते हुए ईशपुत्र ने बताया कि, मतंग ऋषि को जब ब्रह्म ज्ञान की उपलब्धि नहीं हो रही थी, और अन्य गुरुओं और देवताओं ने उनके निम्न जाति को लेकर यह टिप्पणी कर दी कि तुम्हे ब्रह्म ज्ञान उपलब्ध नहीं हो सकता है, तब मतंग ऋषि ने अपनी गुरु माता पार्वती से मातंगी महाविद्या जैसी उच्च साधना का ज्ञान लिया। मातंगी महाविद्या की साधना कर मतंग ऋषि ब्रह्म ज्ञान को उपलब्ध हुए।
मातंगी महाविद्या की साधना से किसी भी जाति में जन्मा साधक, चाहे वह साधारण स्तर का ही क्यों न हो अपना कल्याण कर सकता है, वह मातंगी माँ की इस अद्वितीय साधना से कलाओं में पारंगत होता है और अंत में ब्रह्म ज्ञान को उपलब्ध होता है।

दो दिवसीय इस शिविर में ईशपुत्र ने हिमालय में संरक्षित मातंगी महाविद्या से जुड़े गूढ़ रहस्यों को साधकों के समक्ष रखा। इस दौरान ईशपुत्र ने साधकों के मन में उठ रहे अनेकानेक प्रश्नों का समाधान भी किया। शिविर के दूसरे दिन महाविद्या मातंगी के यन्त्र का आवरण पूजन संपन्न किया गया। आवरण पूजन के पश्चात ईशपुत्र ने साधकों को मातंगी महाविद्या की शक्तिदीक्षा प्रदान की। शक्तिदीक्षा के माध्यम से ईशपुत्र ने साधकों के अन्दर माहाविद्या मातंगी की साधना करने की योग्यता का बीज प्रत्यारोपित किया।
इस तरह मातंगी महाविद्या का दो दिवसीय शिविर संपन्न हुआ, और हिमालय के रहस्यों में छिपी यह महान साधना कलियुग के जिज्ञासु-साधकों के लिए उपलब्ध हो पाई।

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