स्कूल में सुबह की क्लोसेज बच्चों को कर रही हैं बीमार

लेकिन यहां आपको अब सावधान हो जाने की जरूरत है। दरअसल, स्कूलों की दूरी और सुबह जल्द लगने वाली कक्षाओं के चलते बच्चे अनिंद्रा (डे टाइम स्लीपनेस) के शिकार हो रहे हैं

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : शायद ही कोई अपने स्कूल में बिताए समय को भूल सकता है। स्कूल की अच्छी और बुरी यादें आज भी आपके जहन में जिंदा हैं, जिनका ख्याल आते ही आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। इन खट्टी-मिठ्ठी यादों में वो सुबह जल्दी उठना, स्कूल के लिए तैयार होना और कहीं लेट न हो जाए इस डर से जल्दबाजी में स्कूल के लिए भागना भी शामिल है। आज भी मानों, परंपरा के तौर पर बच्चों को स्कूल भेजने का यह सिलसिला जारी है। लेकिन यहां आपको अब सावधान हो जाने की जरूरत है। दरअसल, स्कूलों की दूरी और सुबह जल्द लगने वाली कक्षाओं के चलते बच्चे अनिंद्रा (डे टाइम स्लीपनेस) के शिकार हो रहे हैं।दरअसल, स्कूलों की टाइमिंग (सुबह की क्लासेज) के कारण बच्चों को जल्द से जल्द सोकर उठना पड़ रहा है। इससे उनकी नींद पर गहरा असर पड़ रहा है। ऐसे बच्चों का औसत नींद का स्तर सामान्य नींद के स्तर से अधिक हो गया है। जिस वजह से बच्चे करीब एक घंटे तक की कम नींद ले पा रहे है।नींद पूरी नहीं होने से बच्चों में तनाव, अनिंद्रा, एकाग्रता की कमी और मोटापा का खतरा मंडरा रहा है। जबकि दिन के शिफ्ट वाले स्कूलों में बच्चों की निंद्रा ठीक हो रही है, यानी वे अपनी नींद पूरी ले पा रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पंडित रविशंकर शुक्ल विवि के लाइफ साइंस विभाग के रिसर्च गाइड डॉ. आरके प्रधान एवं स्कॉलर निहारिका सिन्हा के मुताबिक अध्ययन में अनिंद्रा के कारण सुबह शिफ्ट वाले स्कूलों के बच्चों में अनिंद्रा व अन्य जोखिम के संकेत मिले हैं। इस अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय जनरल रिसर्चगेट पर इम्पैक्ट ऑफ कम्युनिकेटिंग डिस्टेंस एंड स्कूल टाइमिंग ऑन स्लीप ऑफ स्कूल स्टूडेंट्स शीर्षक के साथ प्रकाशित किया गया है।इस अध्ययन के लिए करीब 14 साल के स्कूली बच्चों को चुना गया। इनमें सुबह शिफ्ट में यानी सुबह 7:30 बजे लगने वाले स्कूलों और सुबह 11 बजे लगने वाले रायपुर के स्कूलों से 84-84 बच्चों पर अध्ययन किया गया। इन बच्चों के वजन, ऊंचाई आदि को मापा गया। साथ ही, इनके बेड टाइम और वेक अप टाइम (रोने और जगने का समय) को मापा गया। जो बच्चे सुबह के स्कूल में जाने हैं, उनमें अनिंद्रा की अधिक शिकायत मिली। इससे उनमें भारी तनाव, अत्यधिक निंद्रा, बच्चों में मोटापा भी देखा गया।अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जो बच्चे सुबह 7:30 बजे लगने वाले विद्यालय में पढ़ते हैं। उन्हें सुबह 5:23 बजे औसतन उठना पड़ता है। जबकि दिन के स्कूल जो कि सुबह 11 बजे लगते हैं, उनके बच्चे औसत 7 बजे सोकर उठते हैं। ऐसे में सुझाव दिया गया है कि दिन के शिफ्ट वाले विद्यालयों के समय को बढ़ाया जाए।’डे टाइम स्लीपनेस’ नींद से जुड़ी एक ऐसी समस्या है, जिसमें मरीज कभी भी अचानक सो जाता है। नींद कम लेने की वजह से वह अप्रत्याशित जगहों पर सो जाता है। इस बीमारी में मरीज बैठे-बैठे, यहां तक कि हंसते हुए या रोते हुए भी सो जाता है। मरीज दिनभर उनींदा और थका हुआ रहता है। यह बीमारी ज्यादातर 14 से 25 साल की उम्र के लोगों को अपना शिकार बनाती है।डब्ल्यूएचओ संगठन के मुताबिक एक व्यक्ति को कम से कम 8 घंटे सोना चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक माता-पिता को इस बात को सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके स्कूल जाने वाले बच्चे (6 से 14 वर्ष की आयु) नौ घंटे से कम नींद न लें। उनके लिए 11 घंटे तक की नींद सर्वोत्तम है। एक से दो वर्ष की आयु के बच्चों के लिए 11-14 घंटे, जबकि तीन से पांच वर्ष की आयु के बच्चों को 11-13 घंटे की नींद लेने की जरूरत है।शहर के आउटर में लगने वाले ज्यादातर स्कूलों में शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत तय किए गए स्कूलों की दूरी के मापदंड को फेल कर दिया गया है। यहां रसूखदार विद्यालयों में पढ़ाने के लिए बच्चों को पालक 10 से 15 किलोमीटर की दूरी से भेज रहे हैं। जबकि प्राइमरी स्तर पर अधिकतम दूरी 3 किमी, अपर प्राइमरी स्तर पर 5 किमी और हाई स्तर पर 7 किमी से अधिक दूरी के विद्यालय नहीं होने चाहिए।

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