बंगाल की मिट्टी आज ‘श्री गणेश’ के रूप में पहुंचेगी भक्तों के घर

इंदौर में मुख्य रूप से बंगाल से आए कारीगर ही मिट्टी की बड़ी मूर्तियां बनाते हैं

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : शहर के ताल-तालाबों से लेकर कोलकाता की गंगा किनारे तक की मिट्टी गुरुवार को गणपति का रूप धारण कर हजारों घरों में पहुंचेगी। इंदौर के मूर्तिकारों के मुताबिक इस बार इंदौर में लगभग पांच लाख गणेश मूर्तियां बनी हैं। इनमें लगभग डेढ़ लाख मिट्टी की हैं जो पिछले दो सालों के मुकाबले लगभग दो गुना है। इसके अलावा ईकोफ्रेंडली वर्कशॉप, स्कूल-कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं द्वारा घरों में लोगों ने अपने-अपने तरीके से मिट्टी की गणेश मूर्तियां बनाई हैं।इंदौर में मुख्य रूप से बंगाल से आए कारीगर ही मिट्टी की बड़ी मूर्तियां बनाते हैं। लगभग तीस साल से इंदौर में मूर्तियां बना रहे शक्ति पाल के अनुसार करीब तीन साल में मिट्टी की मूर्तियों की मांग लगभग 30 फीसद बढ़ी है। मूर्ति बनाने के लिए जिस तरह की चिकनी मिट्टी चाहिए, वह आमतौर पर यहां उपलब्ध नहीं होती, इसलिए कोलकाता से गंगा की मिट्टी मंगवाते हैं, ताकि बेहतर आकार दिया जा सके। मूर्तिकार पवन पाल का कहना है कि यहां बनी मूर्तियां राजस्थान भी जाती हैं। जो स्थानीय कारीगर मिट्टी की मूर्तियां बनाते हैं वे यशवंत सागर, धार, बेटमा, भावनगर (गुजरात) और लखनऊ से भी मिट्टी मंगवाते हैं।होलकर राजवंश, जमींदार व सूबेदार परिवारों में 250 साल से मिट्टी की गणेश मूर्ति स्थापित करने की परंपरा चली आ रही है। होलकर राजवंश के लिए मूर्ति बनाने वाले खरगोणकर परिवार की पांचवीं पीढ़ी के कलाकार श्याम खरगोणकर बताते हैं कि मूर्ति को पालकी में बैठाने से पहले पूजा की जाती है। राज परिवार के उदय सिंह राव होलकर और बालराजे खुद मूर्तियां लेने यहां आते हैं।मूर्ति बनाने की परंपरा मोरोपंथ खरगोणकर ने शुरू की थी। वे राजपरिवार में रंगोली व कला विभाग में थे। तब उन्हें उस वक्त के राजा ने ऐसी मूर्ति बनाने के लिए कहा जो राजपरिवार के अनुरूप हो। तब दो मूर्ति बनाई गई। एक में होलकर शासकों की पगड़ी और माथे पर त्रिपुंड बनाया गया, जबकि दूसरी मूर्ति में मुकुट और माथे पर साधारण तिलक। उसी शैली में आज तक मूर्तियां बनती आ रही हैं। ये मूर्तियां पीली मिट्टी से बनती हैं।मूर्ति बनाने की शुरुआत वसंत पंचमी से होती है। इस दिन शुभ मुहूर्त में तीन छोटी-छोटी मूर्तियां बनाई जाती हैं। इन तीनों को बाद में होलकर राजवंश की दो और जमींदार परिवार की एक बड़ी मूर्ति के पेट में स्थापित कर दिया जाता है।जागरूकता और अभियानों की वजह से पीओपी की मूर्तियों की संख्या में आठ गुना तक गिरावट आई है। निर्माता और विक्रेता कैलाश प्रजापत के अनुसार चार साल पहले तक वे पीओपी की 10 हजार मूर्तियां बेचते थे, जबकि गत दो सालों में संख्या घटकर 2 हजार रह गई है। 70 वर्षीय मूर्तिकार सुरेश कुमार के अनुसार वर्तमान में मिट्टी की मूर्ति की मांग ज्यादा है, लेकिन इसके लिए हमारे पास मिट्टी, स्थान और वक्त की कमी रहती है।पंडित अमर अभिमन्यू डब्बावाला के अनुसार घर में पूजन करने के लिए मूर्ति का आकार 3 से 14 इंच का ही होना चाहिए। मूर्ति पूजन के लिए तीर्थ क्षेत्र की मिट्टी का इस्तेमाल होता है। शुद्ध काली या पीली मिट्टी को गंगाजल या तीर्थ के जल से पवित्र कर मूर्ति बनाना चाहिए।

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