जालंधर में मनाया गया ‘महायोगी सत्येन्द्र नाथ’ (ईशपुत्र) ‘अवतरण दिवस’

महायोगी सत्येन्द्र नाथ के शिष्यों ने उनके श्री चरणों की पूजा कर गुरु चरण पूजन संपन्न किया

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : 23 अगस्त 2018  को जालंधर में कौलान्तक पीठ के वर्त्तमान पीठाधीश्वर श्रद्धेय महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज का अवतरण दिवस मनाया गया। कौलान्तक पीठ के सिद्ध वास्तु शिविर का आयोजन जालंधर में होने के कारण महायोगी सत्येन्द्र नाथ यहां उपस्थित थे। इस अवसर पर उनके अनेकों शिष्यों ने उन्हें बधाई दी और उपहार प्रस्तुत किए।आधुनिक परंपरा के अनुसार केक कटिंग सेरेमनी का भी आयोजन किया गया। इसके पश्च्यात महायोगी सत्येन्द्र नाथ के शिष्यों ने उनके श्री चरणों की पूजा कर गुरु चरण पूजन संपन्न किया।इस अवसर पर अपने शिष्यों को उपदेश करते हुए महायोगी सत्येन्द्र नाथ ने कहा “ नमो आदेश, सभी भैरव भैरवियों की जय हो और मैं बहुत प्रसन्न हूँ आज, आप सभी का प्यार ऐसे ही बना रहें क्योंकि मेरे पृथ्वी पर आने का और आप लोगों के बीच आने का बस एक ही मकसद है और वह है आप सब लोग, क्योंकि ना मुझे धन चाहिए, ना समान्न, ना कोई मोह है ना कोई ममता !, बस एक ही है, वह है आप लोगों का प्रेम, गुरमंडल के आदेश और आज्ञा का पालन कर रहा हूँ, और आप लोगों के बीच में हूँ। ख़ुशी इस बात की है की धीरे – धीरे उम्र के पड़ाव में आगे बढ़ता जा रहा हूँ और आप सब का प्यार मुझे लगातार मिलता जा रहा है, और ख़ुशी इस बात की भी है की आप जैसे प्यारे – प्यारे सुन्दर भैरव – भैरवी मेरे पास है। तो आप सब के होने से मेरी ज़िन्दगी और भी सुखद और ख़ुशी भरी हो गई है। बस यही उम्मीद करता हूँ की आप सब साधना ठीक तरह से करते रहेंगे और गुरूमंडल का जो आदेश है उसका पालन करते रहेंगे। आप सबने जो बधाई सन्देश दिये है वह मुझ तक पहुँच गये है। मैं अपने ह्रदय से आप सब को आशीर्वाद देता हूँ और प्रार्थना करता हूँ की आप लोग भी शीर्षस्थ योगी बने।बहुत बहुत धन्यवाद ! इन सारी शुभकामनाओं के लिए, ॐ नमः शिवाय प्रणाम ”          

कौन है ‘महायोगी सत्येन्द्र नाथ’ (ईशपुत्र) ?

महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज 23 अगस्त 1983 के ब्रह्ममूहुर्त में अवतरित हुए, जिनके श्रीमुख से निकला हर शब्द मन्त्र बन जाता है । तीन वर्ष की बाल्यावस्था से कंदराओं में मंत्रगुंजनाओं के साथ-साथ खेले, पले व युवा हुए । एकांत, ध्यान, साधना, सदाचार बालपन से उनके खिलौने रहे । योग, ज्योतिष, तंत्र, आयुर्वेद, वास्तु जैसे विषयों  मेँ उनका तब भी कोई सानी नहीँ था जब इनकी आयु मात्र 10 वर्ष थी । महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी कई वर्षों तक हिमाच्छादित पर्वतशृंखलाओँ में, साधनाओं में तल्लीन रहें । इनकी गुप्त साधनास्थलियोँ तक पहुँच पाना सामान्य जनमानस के लिए अत्यंत दुष्कर है । 12 वर्ष की आयु मेँ उनको गुरुओँ ने गुरु पदवी प्रदान की था । महायोगी जी के करीबी शिष्योँ का कहना है कि, “तीन वर्ष की आयु मेँ दीक्षाग्रहण के उपरांत ही महायोगी जी वैराग्य को प्राप्त हो गये थे । सात वर्ष की उम्र से इनकी अतिगोपनीय साधनाओं  का दौर शुरु हुआ; इस दौरान महायोगी जी हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल, जम्मु-कश्मीर की हिमकंदराओं में अपने गुरु के सानिध्य मेँ ध्यान, योग व तंत्रसाधनाओँ की दीक्षा ग्रहण करने मेँ लीन रहे । तत्पश्चात महायोगी नें अनेकों ग्रंथों का गहन अध्ययन किया । 16 वर्ष की आयु मेँ इन्हें प्रथम समाधि का अनुभव हुआ !” आज महायोगी जी गुरुआज्ञा से साधनाओं में रत रहनें के साथ-साथ लोककल्याण हेतु अंतरंग शिष्यों को परम तत्त्व का बोध करवाते हुए विश्व कल्याण के लिए प्रेरित करते है । इनका प्रेरणावाक्य है : “सर्व भूत हिते रताः ।” अर्थात् संसार के सभी प्राणियों के हितार्थ तत्पर । उनके प्रमुख गुरु प्रातः स्मरणीय महाहिमालयाधिपति सकल कलानायक श्री सिद्ध सिद्धान्त नाथ जी महाराज रहे; उनके अतिरिक्त भी अन्य 37 गुरुओं से उन्होनें अनेकों प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया । श्रद्धेय महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी भहाराज भगवान शिव की उस नित्य परंपरा के दिव्य प्रबोधक है जिन्होनें शब्दों से अधिक अनुभव को अपने जीवन मेँ स्थान दिया है । विराट हिमालय, अटखेलियाँ करता समुद्र, सुमसान रेगिस्तान से लेकर घने वनप्रदेशों तक सर्वत्र श्री योगेश्वर तत्त्वरुप मेँ छाए हुए है । दिव्यता, चैतन्यता, पवित्रता, प्रेम, करुणा और सौहार्द्र जैसे गुणों। से आप्लावित दिव्यमूर्ति महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी का ध्यान साधनामार्ग में साधक को दिव्य मनोउर्जा, मनोबल व तेज प्रदान करता है । 21 वर्ष की उम्र में उनको कौलान्तक पीठ के पीठाधीश्वर की पदवी दी गयी । उसके बाद उनको एक ही पदवी की आवश्यकता थी जिनको “पंचपीठाधिपति” कहा जाता है ।

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