9 अगस्त : आज के ही दिन क्रांतिवीरों द्वारा लूटी गई थी काकोरी स्टेशन पर वो ट्रेन जिसने हिला दी थी ब्रिटिश सत्ता की जड़े!!

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : नई दिल्ली। वो समय था ये जब आज़ादी के कुछ तथाकथित ठेकेदारों के कपड़े विदेश धुलने जाते थे। जबकि भारत के क्रांतिवीरों के पास चने खाने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे। उनके पास पैसे नहीं बल्कि बाहुबल था और वो उसी से लड़ रहे थे। यद्द्पि चाटुकार कलमकारों ने उन्हें भुला दिया और किताबें रंग दी उनकी गुणगान से जिन्होंने देश को परोक्ष रूप से तबाह कर दिया। आज देश का मज़हबी, जातिगत, भाषाई आदि रूप में विसंगति उन्ही तथाकथित आज़ादी के ठेकेदारों की ही देन मानी जा सकती है। 

काकोरी काण्ड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारियों द्वारा ब्रिटिश राज के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने की खतरनाक मंशा से हथियार खरीदने के लिये ब्रिटिश सरकार का ही खजाना लूट लेने की एक ऐतिहासिक घटना थी जो 9 अगस्त 1925 को घटी। इस ट्रेन डकैती में जर्मनी के बने चार माउज़र पिस्तौल काम में लाये गये थे। इन पिस्तौलों की विशेषता यह थी कि इनमें बट के पीछे लकड़ी का बना एक और कुन्दा लगाकर रायफल की तरह उपयोग किया जा सकता था। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के केवल दस सदस्यों ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया था। ये वो क्रांतिवीर थे जिनका नाम न के बराबर लिया गया बिके कलमकारों द्वारा। 

क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे आजादी के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था की जरूरत के मद्देनजर शाहजहाँपुर में हुई बैठक के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी थी। इस योजनानुसार दल के ही एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने 9 अगस्त 1925 को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी “आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन” को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खाँ, कि चन्द्रशेखर आज़ाद व ६ अन्य सहयोगियों की मदद से समूची ट्रेन पर धावा बोलते हुए सरकारी खजाना लूट लिया। यद्द्पि उनके कार्य की गूंज विदेशों तक गयी, अंग्रेजो से विश्वयुद्ध की तैयारी कर रहे तमाम देशों तक ये खबर गयी जिन्होंने इन वीरों का लोहा माना पर भारत के ही कुछ तथाकथित अहिंसावादियों ने इसको गलत बताया और उनके ही गलत बताने के चलते ही बाद में इन वीरों की किसी ने मदद नही की थी। 

बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के कुल ४० क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने,सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह को मृत्यु-दण्ड (फाँसी की सजा) सुनायी गयी। इस मुकदमें में १६ अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम ४ वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम काला पानी (आजीवन कारावास) तक का दण्ड दिया गया था।

कुछ क्रांतिकारियों के नाम कुछ राष्ट्रभक्त इतिहासकारों के चलते सामने आ गए लेकिन कई फिर भी रह गए गुमनाम!  आज उस शौर्यमय दिवस पर उन सभी ज्ञात अज्ञात वीरों को बारम्बार नमन करते हुए उनकी गौरवगाथा सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प NLN परिवार लेता है। 

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