“गुरु पूर्णिमा” : आज के दिन 1 मंत्र का जाप करने से बरसने लगेगी गुरुकृपा, छूट जाएंगे जग के सब बंधन..अद्भूत आनंद की होगी प्राप्ति!!

अंधकार रूपी अज्ञान में व्याप्त जीव को ज्ञानरूपी प्रकाश प्रदान करने वाला गुरु ही कहलाते है।

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन भगवान वेद व्यास का जन्म हुआ था, उन्होंने वेदों के विभाग किए, महाभारत की रचना की, 18 पुराणों की रचना की तथा वेदांत सूत्रों का प्रणयन किया। ऐसा कहा जाता है कि संसार में जो भी ज्ञान है वो वेद व्यास के ज्ञान का उचिष्ठ ही है। भारतीय परंपरा के अनुसार गुरु को ज्ञान रूपी प्रकाश कहा गया है जो शिष्य के अज्ञान रूपी अंधकार को को काटकर वास्तविक सत्य का बोध कराता है। गुरु शिष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से मिलाता परंतु ये तभी संभव हो पाता है..जब गुरु भी वास्तविक गुरु हो, जो साधना की आंच पर तपा हो और शिष्य भी पात्र हो जो शिष्यत्व धारण कर सके। ज्ञान तभी प्राप्त होता है जब शिष्य अहंकार त्याग निस्वार्थ भाव से गुरु सेवा करे। ये गुरु-शिष्य परंपरा स्वयं महादेव से शुरू होती है। पात्रता अर्जित करने के लिए शिष्य को ‘गुरु गीता’ का सेवन करना चाहिए। हर मनुष्य को चाहिए कि अपने जीवन किसी योग्य गुरु की तलाश करें.. बाकि आपके जीवन में गुरु आपको अवश्य मिलते है जब आपके  भीतर पात्रता हो! गुरु के कई भेद है..भारतीय परंपरा में तो गुरु का दर्जा भगवान से ऊपर कहा गया है! गुरु-शिष्य का संबंध तो अद्भूत है… जो सबसे निराला है। हिमालय आज भी गुरु-शिष्य परंपरा जीवंत है…जो केवल पात्रों को उपलब्ध है। क्यूंकि सृष्टि केवल पात्रों को देती है..जो जिस चीज का पात्र होता है ये सृष्टि उसे वो अवश्य देती है। इसलिए पात्रता प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए मंत्र का जाप करें। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु को याद करना चाहिए। अगर किसी के कोई देहिक गुरु नहीं है तो शिव को गुरु मान गुरु पूर्णिमा मना सकते है…क्यूंकि शिव ही आदि गुरु है। शिव से ही ये परंपरा निरंतर चलती आ रही है। अगर आप भी शिव की अद्भुत गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़कर वास्तविक आनंद को प्राप्त करना चाहते हैं तो आज से ही नीचे दिए गए मंत्र का जाप शुरु कर दें! 

ॐ सं सिद्धाये नमः”

इस मंत्र का निरंतर स्मरण करने से ही मनुष्य को ज्ञानार्जन और ज्ञानवृद्धि उत्पन्न होती है।

“बिन गुरु होय ना ज्ञान” कहकर तुलसीदास ने भी गुरु के महत्व का प्रतिपादन किया है। यही कारण है कि भगवान श्री राम को, भगवान श्री कृष्ण को भी अपने जीवन में गुरु के आश्रम में जाकर शिक्षा दीक्षा ग्रहण करनी पड़ी थी। अंधकार रूपी अज्ञान में व्याप्त जीव को ज्ञानरूपी प्रकाश प्रदान करने वाला गुरु ही कहलाता है।

अज्ञान तिमिरानधस्य ज्ञानांजन शलाकया। 

चक्षु रूनमी ऋतम येन तस्मय श्री गुरुमे नम:।। 

तुलसीदास जी के अनुसार किसी बड़े शैल में छिपे हुए रत्नों का दर्शन कराने वाली गुरु की ही दी हुई दृष्टि होती है और गुरु हृदयरूपी नेत्रों को ज्ञान की शलाका से उन्मीलित कर ज्ञान चक्षुओं को खोलकर संपूर्ण दृश्य का आभास करा देते हैं। संसार में जितने भी प्रकार का ज्ञान है उन सभी ज्ञानों में दिव्य आध्यात्मिक ज्ञान का प्रदाता सद्गुरु ही होता है। भगवान वेद व्यास ने अपनी रचनाओं का प्रणयन कर सारे आर्यावर्त को आलोकित किया है।वेदों को अपौरुषेय कहा जाता है। भगवान वेद व्यास ने अध्ययन की दृष्टि से पूर्वोक्त एकमात्र वेद का विभाजन कर ऋक्, यजु, साम, अथर्व इन चार वेदों में विभक्त कर अपने चार प्रमुख शिष्यों को उनका अध्ययन कराकर पारंगत किया। पैल, सुमंतु, जैमिनी तथा वैषंपायन को ज्ञान की दिव्य दृष्टि देकर वेदों का अध्ययता बनाकर संपूर्ण संसार को प्रकाश से आलोकित किया।

ब्रह्म सूत्रों का प्रणयन कर भगवान वेद व्यास ने ईश्वर, जीव, माया की संरचनाओं और इसने संबंधित प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशत्व और वशत्व को दृष्टिगोचर किया। लोगों को अध्यात्म की दृष्टि देकर जहां एक ओर ईश्वर के निकट लाने का कार्य किया वहीं दूसरी ओर सांसारिक निर्वहन हेतु अनेक प्रकार से नियमों का निर्वचन कर श्रेष्ठ जीवन जीने की कला भी सिखाई। कलयुग में जब मानव के मानसिक स्तर में न्यूनता आने लगी तो उन्होंने अपने पूर्वनिर्मित वांगमय की पुराणों के रूप में व्याख्या कर लोगों को ज्ञान अर्जन कराया। वर्तमान युग में गुरु पूर्णिमा के दिन अपने-अपने अध्यात्मिक गुरुओं का पूजन करते हुए हम भगवान वेद व्यास का ही आव्हान करते हैं।

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