सिद्धों का अचूक उपाय – आप भी चाहते हो पापों से मुक्ति, तो करें “चंद्रायण व्रत साधना”

(एनएलएन मीडिया – न्यूज़ लाइव नाऊ) : प्राचीन काल से लेकर योग्य साधक अपने योग्य गुरु के सानिध्य बैठ कर साधना करते आए हैं। हमारे सिद्धो, ऋषि-मुनियों और धर्मगुरूओं ने कई रहस्यमय विद्याओं को संजोए रखा और गुरु-शिष्य परम्परा में इस ज्ञान को आगे बढ़ते गए। भारत भूमि की ये महानता रही है कि यहां के गुरुओ का स्तर अध्यात्म में इतना उच्चतम रहा है कि स्वयम भगवान जब इस धरती पर अवतरित होकर आए उन्होंने भी गुरु चरणों का सेवन किया। आज भी हमारे बीच कई सिद्ध मौजूद हैं जिन्हें पहचानने के लिए हमारे अंदर पात्रता नहीं। इसी पात्रता को उत्पन करने के लिए चन्द्रयान व्रत सिद्धो का अचूक उपाय है। कुछ लोगों के मन में यह जानने की जिज्ञासा जरूर होती हैं कि आखिर ये चन्द्रायण व्रत साधना है क्या, इस साधना को करने वाले जानकार बताते हैं कि जो व्रत चन्द्रमा की कलाओं के साथ साथ किया जाता है, उसे चन्द्रायण व्रत कहते है । इस व्रत साधना को पूर्णमासी से आरम्भ करते है और एक माह बाद पूर्णमासी को ही समाप्त किया जाता है।

धर्म गुरु डॉ. प्रणव पंड्या (अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख ) ने चंद्रायण व्रत साधना के बारे में बताते हुए कहा कि- इस व्रत को करने से सभी तरह के पापों का नाश हो जाता हैं, यह कठिन जरूर है पर इसका फल अद्वतीय हैं, प्राचीन काल में ऋषि मुनि लगातार इस व्रत साधना को किया करते थे, परिणाम स्वरूप वे स्वस्थ और शतायु हुआ करते थे और आज के समय में भी सैकड़ों साधक इसे करते हैं । इस व्रत में व्यक्ति अपनें भोजन को 16 हिस्सों में विभाजित करतें है । प्रथम दिन यानि पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा 16 कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है । अगले दिन से भोजन का १६वां भाग प्रत्येक दिन कम करते जाते है और अमावस्या को चन्द्रमा शून्य (0) कलाओं वाला होता है अतः इस दिन भोजन नहीं लिया जाता, यानि की पूर्ण व्रत करतें हैं । अमावस्या के अगले दिन से पुनः भोजन की मात्रा में 16 वें भाग की बढ़ोतरी करते जाते है और पुनः पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा 16 कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा ही लिया जाता हैं ।

शास्त्र कहते हैं कि इस व्रत को करने वाले व्यक्ति के द्वारा किए गए पापों का प्रायश्रित्त हो जाता हैं । प्रायश्रित्त शब्द प्रायः+चित्त शब्दों से मिल कर बना है ।

इसके दो अर्थ होते है ।

प्रायः पापं विजानीयात् चित्तं वै तद्विशोभनम् ।

 प्रायोनाम तपः प्रोक्तं चित्तं निश्चय उच्यते ॥

(1) प्रायः का अर्थ है पाप और चित्त का अर्थ है शुद्धि । प्रायश्चित अर्थात् पाप की शुद्धि ।

(2) प्रायः का अर्थ है पाप और चित्त का अर्थ है निश्चय । प्रायश्चित अर्थात् तप करने का निश्चय ।

दोनों अर्थों का समन्वय किया जाये तो यों कह सकते हैं कि तपश्चर्या द्वारा पाप कर्मों का प्रक्षालन करके आत्मा को निर्मल बनाना । चंद्रायण व्रत का सामान्य क्रम यह है कि जितना सामान्य आहार हो, उसे धीरे धीरे कम करते जाना और फिर निराहार तक पहुँचना । 

चन्द्रायण व्रत साधना के नियम : 1- जल कम से कम 6 से 8 ग्लास घूंट घूंट करके बैठ कर दिन भर में पीना ही है । अन्यथा कब्ज की शिकायत हो सकती हैं । 

2- यदि जप तप ध्यान प्राणायाम योग और स्वाध्याय सन्तुलित हुआ तो कमज़ोरी नहीं होगी फिर भी कमजोरी से बचने के लिए ग्लूकोज़ पानी या किसी ताजे फल का रसाहार लिया जा सकता हैं ।

2- चन्द्रायण व्रत के दिनों में सन्ध्या, स्वाध्याय, देव पूजा, गायत्री जप, हवन आदि धार्मिक कृत्यों को नित्य नियम के साथ करना, भूमि शयन, एवं ब्रह्मचर्य का विधान आवश्यक है। 

3- एक माह तक चलने वाले इस व्रत के साथ एक सवा लाख गायत्री मंत्र जप अनुष्ठान, प्रतिदिन 40 माला या कम से कम 11 माला जप अनुष्ठान करन से साधना का फल अधिक मिलता हैं । व्रत की समाप्ति के बाद यज्ञादि अवश्य करें और अपनी कमाई में से कुछ धन दान करें ।

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