इकोनॉमी अब सुधार पर: मोदी के इकोनॉमिक एडवाइजर

नई दिल्ली.नीति आयोग के मेंबर बिबेक देबरॉय ने माना है कि नोटबंदी से इकोनॉमिक ग्रोथ को टेम्परेरी शॉक (अस्थायी झटका) लगा है। हालांकि, उन्होंने ये भी माना कि अब देश की इकोनॉमी सुधार के रास्ते पर है। देबरॉय नरेंद्र मोदी के इकोनॉमिक पॉलिसी एडवाइजर भी हैं। उन्होंने कहा कि अब खराब दौर बीत चुका है और चीजें अब सुधर रही हैं। बता दें कि पिछले साल 8 नवंबर को मोदी ने 500 और 1000 के नोट बंद करने का एलान किया था। नोटबंदी का एक साल पूरा होने पर देश में इसके फायदे और नुकसान पर बहस चल रही है।
 नोटबंदी को छोटे फायदे के तौर पर ना देखें
– देबरॉय ने न्यूज एजेंसी से बातचीत में नोटबंदी के कई पहलुओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा- इसे (नोटबंदी को) छोटे फायदे के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसका मकसद एक सिस्टम में सफाई की कोशिश है।
– उन्होंने कहा- हां, पहले कुछ चीजें उतार पर थीं लेकिन अब हम वापस चढ़ाई यानी सुधार के रास्ते पर हैं। अगर आप आंकड़ों को देखें तो पाएंगे कि ग्रोथ रेट में कमी आई। लेकिन, यह ग्रोथ रेट में कमी आना या रोजगार कम होना टेम्परेरी शॉक की तरह हैं। देबरॉय इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल के चेयरमैन भी हैं। प्रधानमंत्री ने हाल ही में इस काउंसिल के साथ एक बड़ी मीटिंग भी की थी।
 नोटबंदी सिर्फ इकोनॉमी का हिस्सा नहीं
– देबरॉय का कहना है कि नोटबंदी को सिर्फ इकोनॉमी के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा- अगर मैं इसे सिर्फ छोटे आर्थिक फायदे की तरह देखता हूं तो ये सही नहीं होगा। क्योंकि इसके पीछे मकसद सिर्फ इकोनॉमी नहीं थी। हम सिस्टम की सफाई करना चाहते थे। इसको मैं माप (measure) कैसे सकता हूं?
– उन्होंने आगे कहा, “अगर मैं इसे सिर्फ इकोनॉमी के नजरिए से देखूंगा तो कुछ खास फायदे और लागत ही नजर आएंगे। अगर पॉलिटिकल और इकोनॉमिक नजरिए से देखूंगा तो एक सिस्टम में सफाई की कोशिश नजर आएगी। इसलिए, मैं इसे कुछ अलग नजरिए से देखता हूं।”
– “पिछले साल तक जीडीपी में कैश का रेश्यो काफी ज्यादा था लेकिन इसमें अब एक तिहाई तक की कमी आई है। नोटबंदी के पहले कैश टू जीडीपी 13 फीसदी के करीब था। लेकिन, अब यह 9 फीसदी के करीब हो गया है। भारत में जरूरत से ज्यादा कैश का इस्तेमाल होता है।”
– “मैं डेवलप्ड कंट्रीज से तुलना नहीं कर रहा हूं लेकिन अगर आप साउथ एशिया के देशों से भी तुलना करें तो पाएंगे कि हमारे देश में बहुत ज्यादा कैश है।”
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 कैश के मामले में बांग्लादेश और श्रीलंका बेहतर
– एक आंकड़े के मुताबिक, 2015 में बांग्लादेश में कैश टू जीडीपी रेश्यो 5.8 जबकि श्रीलंका में 3.5 फीसदी था। पाकिस्तान में यह 9.3 फीसदी के करीब था। लेकिन, भारत में यह करीब 13 फीसदी है। यानी इन देशों से काफी ज्यादा।
– बिबेक कहते हैं, “अब यह एक्ससेसिव कैश खत्म हो गया है। पैसा बैंकिंग सिस्टम में वापस आ रहा है। लेकिन, यह पूरा पैसा कानूनी नहीं है। इसकी स्क्रूटनी की जा रही है।” उन्होंने कहा कि नोटबंदी से जुड़ा हर फैसला सही ही हो, ये जरूरी नहीं है। लेकिन, ये भी ध्यान रखना चाहिए कि इस तरह के फैसले पहले कभी नहीं लिए गए।
 करप्शन के खिलाफ जंग जारी
– देबरॉय के सहयोगी किशोर अरुण देसाई के मुताबिक, 8 नवंबर 2016 को करप्शन के खिलाफ अकेली जंग नहीं माना जाना चाहिए। क्योंकि, भ्रष्टाचार से निपटने के का काम जारी है। देसाई और देबरॉय इकोनॉमी पर एक किताब भी लिख चुके हैं।
– देसाई ने कहा, “हम नोटबंदी की बात ही क्यों करें। इस सरकार ने सत्ता में आने के बाद ब्लैकमनी के खिलाफ एसआईटी बनाई। बेनामी ट्रांजेक्शन एक्ट लाया गया। कोल माइन्स, जन धन योजना और इनकम डिक्लरेशन जैसी स्कीम लाई गईं। सरकार कई बड़े कदम उठा रही है। नोटबंदी तो सिर्फ एक बोल्ड लेकिन छोटा कदम था।”

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