खगोल शास्त्र एवं फलज्योतिष विज्ञान में अद्भुत संशोधन करनेवाले आचार्य वराहमिहीर

खगोल शास्त्र एवं फलज्योतिष विज्ञान में अद्भुत संशोधन करनेवाले आचार्य वराहमिहीर

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आचार्य वराहमिहीर के जन्मस्थान की मध्य प्रदेश शासन से घोर उपेक्षा !

राजा विक्रमादित्य की राजधानी प्राचीन उज्जयिनी (आज का उज्जैन) से केवल २५ कि.मी. की दूरी पर कायथा गांव है। ‘कपित्थक’ इस नाम का आगे जाकर ‘कायथा’ नाम होने का उल्लेख ‘बृहज्जातक’ ग्रंथ में आता है। विशेष बात यह कि, खगोल शास्त्र एवं फलज्योतिष विज्ञान में अद्भुत अविष्कार करनेवाले आचार्य वराहमिहीर की यह जन्मस्थली है; किंतु मध्य प्रदेश शासनद्वारा आजतक इसका थोडा भी संज्ञान भी नहीं लिया गया !  दुर्भाग्य की बात यह कि, आचार्य वराहमिहीर की जन्मस्थली के उपलक्ष्य में कायथा का लौकिक सर्वत्र हो, इस दृष्टि से शासनद्वारा उनका एक साधा स्मारक भी खडा नहीं किया गया।

वर्ष २०१० में पंडित आनंद शंकर व्यास एवं उनके परिवारद्वारा वराहमिहीर का खडा किया हुआ एकमात्र स्मारक यहां है; किंतु अब उसकी भी उपेक्षा ही हो रही है !

५वीं शताब्दी में आचार्य वराहमिहीर का जन्म हुआ एेसे बताया जाता है। जोधपुर (राजस्थान) के ज्योतिषाचार्य पंडित भोजराज द्विवेदी के अध्ययन के अनुसार, चैत्र शुद्ध दशमी के दिन उनका जन्म हुआ। वराहमिहीर का परिवार परंपरा से सूर्योपासक था। उनके पिता आदित्यदास ही उनके ज्ञानगुरु थे। पारंपरिक सूर्योपासना को जोडकर तत्कालिन शिक्षापद्धति के अनुसार किए गए ऋग्वेद के तात्त्विक एवं शास्त्रशुद्ध आधार मिल गया होगा। प्राचीन काल में भारत में उदीत खगोल शास्त्र एवं फलज्योतिष शास्त्र भी सूर्य को ही विश्‍व का केंद्र एवं विश्‍व में चल रही गतिविधियों का आद्यकारण मानते हैं। तो सहज ही इन दोनों शास्त्रों की अध्ययन की ओर सूर्योपासक वराहमिहीर का ध्यान आकर्षित हुआ। वराहमिहीर ने इस अध्ययन को ही अपना जीवितकार्य मान लिया तथा उन्होंने अपनी मृत्युतक उसे निरंतर चालू रखा।

उन्होंने गॅलिलियो के उदय से बहुत पहले ही कई अंतरराष्ट्रीय एवं अंतर्देशीय सभाओं में पृथ्वी, गेंद की तरह गोल होने की बात सप्रमाण सिद्ध की !

वे राजा के नवरत्नों में प्रमुख साथ ही रत्नशिरोमणि थे। आचार्य वराहमिहीर ने राजा विक्रमादित्य के पुत्र की मृत्यु का अत्यंत अचूकता से भविष्य विशद किया था। राजाद्वारा सभी प्रकार की सावधानीयां बरतने के पश्‍चात भी उसके पुत्र की मृत्यु आचार्य वराहमिहीरद्वारा विशद की गई भविष्यवाणी के अनुसार ही हो गई !

बृहद्संहिता ग्रंथ में भूकंप के कारण, दिन एवं समय का विस्तृत उल्लेख ! भूकंप की पूर्वसूचना देनेवाले भूकंप के बादलों का अचूक विवेचन किया !

वराहमिहीर की ‘बृहद्संहिता’ में ‘दकार्गल’ नामक अध्याय है। उसमें उन्होंने भूमि के लक्षणोंपर आधारित भूगर्भ के अंतर्गत पानी का संग्रह कैसे खोजा जाता है, इस संदर्भ में अत्यंत उद्बोधक एवं शास्त्रीय जानकारी दी है !

अल-बिरौनी नामक अरब वैज्ञानिक एवं यात्री कहता है, ‘वराहमिहीरद्वारा विशद हर विधान के पीछे शास्त्र एवं सत्य का आधार है !’

वराहमिहीर के सिद्धांतों की उपयुक्तता वर्ष १९८१ में आंध्र के चित्तुर जिले में हुए अवर्षण के समय दिखाई दी। उस समय तिरुपति के श्री वेंकटेश्‍वर विद्यापीठ ने इस्त्रो (भारतीय अवकाश अनुसंधान संस्था) एवं विद्यापीठ अनुदान आयोग की सहायता से एक जलअनुसंधान योजनापर काम किया जा रहा था। उसके अंतर्गत बोअरवेलों की खुदाई की गई। उस समय कुल १५० कुएं खोदे गए और उसमें से हर बोअरवेल में पानी मिला। इस काम के लिए उन्होंने वराहमिहीरद्वारा विशद किए गए लक्षणों का अध्ययन कर पानी खोज निकाला !

आचार्य वराहमिहीर ने अपने ग्रंथों में खगोल शास्त्र, वनस्पति शास्त्र, भूगर्भ शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, मौसम का शास्त्र, जल शास्त्र, प्राणि शास्त्र एवं अन्य शास्त्रों का परस्पर से संबंध तथा उसका मनुष्य जीवन पर होनेवाले परिणामों का अध्ययन एवं विस्तृत विवेचन किया है। उनकेद्वारा लिखित ग्रंथ ‘बृहद्संहिता’ तो उनके दीर्घकालीन, व्यापक अध्ययन की एक अमूल्य धरोहर है। वराहमिहीरद्वारा लिखित खगोल शास्त्र पर आधारित ग्रंथ पंचसिद्धांतिका, साथ ही बृहद्जातक एवं लघुजातक ग्रंथों का आज भी अध्ययन किया जाता है। उनकेद्वारा इस क्षेत्र में किया गया कार्य विस्मयचकित कर देनेवाला है। भारत ने अभीतक यदि उनके वैज्ञानिक विचारों को अपनाया होता, तो अबतक भारतद्वारा विज्ञान के क्षेत्र में बडी उडान भरी जाती !

कायथा गांव के संदर्भ में ‘मिहीर विचार क्रांति मंच’ के अध्यक्ष श्री. महेश पाटीदार ने कहा कि, इस गांव में की गई खुदाई में अनेक प्राचीन मूर्तियां एवं ताम्रपत्र प्राप्त होने से यह गांव ऐतिहासिक एवं पुरातत्व विभाग की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है ! इतिहास विशेषज्ञ श्री. विष्णुधर वाकणकरद्वारा किए गए संशोधन के कारण वर्ष १९६४ में कायथा गांव के संदर्भ में पुरातत्व विभाग को जानकारी मिली। तत्पश्‍चात वर्ष १९६५-१९६७ की अवधि में इस गांव में खुदाई की गई। चित्रगुप्त की तप ‘तपोभूमि’ भी कायथा ही है। ऐसा होते हुए भी अभीतक इस गांव की उपेक्षा ही की जा रही है। न्यूनतम पर्यटन की दृष्टि से तो शासन को इस गांव का विकास करना चाहिए।

कायथा के ‘मिहीर विचार क्रांति मंच’ के श्री. अनिल पांचाळ ने कहा, ‘आचार्य वराहमिहीर की जीवनी का प्रसार हो; इसके लिए हम ने विविध सांस्कृति कार्यक्रम एवं ‘वराहमिहीर’ पुरस्कार देना आरंभ किया है। आचार्य वराहमिहीरजी के संदर्भ में विशेष कार्य करनेवालों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। इस वर्ष यह पुरस्कार जोधपुर के विख्यात ज्योतिषी एवं भविष्यवेत्ता पं. भोजराज द्विवेदी को दिया जाएगा !’

पंडित आनंद शंकर व्यास एवं उनके परिवार ने १ सितंबर २०१० में, कायथा गांव में एक निजी क्षेत्र में आचार्य वराहमिहीर का एक स्मारक खड़ा किया। सद्य:स्थिती में यह स्मारक सभी की ओर से दुर्लक्षित ही रहा है, स्मारक के छत का भी पता नहीं, लोहे की शीट से नाममात्र ढक दिया गया है !

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